December 06, 2011

स्कूटरनामा



हर बारिश के मौसम में मेरी दोस्ती होती थी विजय से। वो मौसम, जिसमें एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी कहे जाने वाले पटना के बहुगर्वित कंकड़बाग कॉलनी का ट्रांसफ़ॉर्मेशन होता था, एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी से इंसान के रिहाइश वाली झील मे। और इसी मौसम में अशोक नगर में रहने वाले मेरे चाचाजी विजय को हमारे घर छोड़ जाते थे। सड़क पर जमा पानी में ना चल पाना उसका नखरा नहीं, उसकी मेकैनिकल मजबूरी थी। क्योंकि विजय का पूरा नाम था विजय सुपर। 80 के दशक का स्कूटर। जीहां शुरूआत थोड़ा नाटकीय रखा  है मैंने आज, क्योंकि स्कूटरों की कहानी मुझे थोड़ी नाटकीय लगती है। स्कूटर चल रही है या चल रहा है इस दुविधा में मैंने लगभग एक दशक निकाल दिया है। बिहार प्रदेश का होने की वजह से मुझे शंका तो हमेशा रही हालांकि पुकारा हमेशा पुल्लिंग ही है। लेकिन तीस-चालीस पहले जाएं और पुरानी वेस्पा स्कूटर को देखें तो वो ऑटोमैटिकली ख़ूबसूरत और कमनीय लगेगी, लगेगा नहीं। हालांकि भारत में प्रिया या बजाज सुपर तक तो वो नैन-नक्श बचे थे लेकिन लैंब्रेटा, विजय सुपर और बजाज चेतक ने स्कूटर को पूरा मेल डोमेन में डाल दिया था। एक ट्रांसफ़ोर्मेशन पूरा हुआ।
1972 में भारत सरकार ने लैंब्रेटा की फ़ैक्ट्री और ब्रांड ख़रीद कर जब भारत में स्कूटरों का नया युग शुरू किया था, स्कूटर इंडिया लिमिटेड के नाम से। तब वजह तो एक ही थी, सस्ता ट्रांसपोर्टेशन। जो कार नहीं ख़रीद सकते थे वो स्कूटर ले लें। गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी झेल रहे देश में ऐसी सवारी की तो ज़रूरत थी ही। इसी कंपनी ने विजय सुपर भी बनाया और एक पूरी पीढ़ी को एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचाया। उसी दौरान एक और कंपनी लगी हुई थी ऐसे ही ट्रांसपोर्टेशन में । बजाज जिसकी कहानी शुरू हुई थी वेस्पा स्कूटरों को भारत में बेचने से। और इसी कंपनी ने सबसे लंबे वक्त तक स्कूटर के झंडे को उठाए रखा था भारत में। बजाज चेतक, सुपर, प्रिया, क्लासिक वगैरह। और बजाज को हमारा बजाज बनाने वाला चेतक, जो देश में स्कूटरों का पोस्टरब्वॉय था, उसका सफ़र भी बड़े नाटकीय ढंग से ख़त्म हुआ। बेटे राजीव बजाज ने कहा कि नहीं बनाएंगे अब पिता ने कहा कि हां बनाएंगे। वो कहानी भी ख़त्म हुई।
मुझे वो वक्त तो याद है जब हीरो हौंडा की एंट्री हुई थी। जब सीडी 100 आई थी, जो मुझे येज़डी और बुलेट की भीड़ में अजीब सी सवारी लगती थी। लेकिन उस वक्त नहीं पता था कि यही बाइक कहानी ख़त्म करेगी स्कूटरों की भारत में। हीरो हौंडा ने जिस तरीके से भारत का मोटरसाइकिलीकरण किया, वो आज तक जारी रहा है। लेकिन एक और विडंबना ये है कि जिस हौंडा ने भारत में स्कूटरों को ख़त्म किया, वही उसे वापस लाई भी। जब एलएमएल वेस्पा से लेकर बजाज ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे वहीं हौंडा मोटरसाइकिल्स एंड स्कूटर्स ने भारत में स्कूटरों में अपना भविष्य देखा। फ़ोर स्ट्रोक और बिना गियर की ऐक्टिवा आज देश के लगभग सभी शहरों में दिखेगी, और ग्राहक इसके लिए तीन-चार महीने इंतज़ार भी कर रहे हैं। और इसी के साथ शुरू हो चुका है स्कूटर का यू-टर्न।
वैसे स्कूटरों की बात अधूरी रहेगी अगर काइनेटिक हौंडा का ज़िक्र ना हो। यंगस्टर्स के बीच जो पुकारी जाती थी काईनी। बिना गियर की काईनेटिक हौंडा इतनी हिट हुई थी, हालांकि तबके स्कूटरों के मुक़ाबले उसकी हल्की बॉडी का हमेशा मज़ाक होता था। मेरे एक मित्र की फेवरेट कहानी है कि वो और उनके पिताजी, पुरानी लैंब्रेटा से जा रहे थे और सामने से एक काइनेटिक हौंडा आ गई...दोनों की कमर लड़ी, काइनेटिक पलट गई लेकिन लैंब्रेटा मस्त चाल में चलती रही। उसकी चाल में कोई फर्क नहीं आया। लेकिन उस किस्से को अब बहुत दिन हो गया है...

*Published




November 20, 2011

Bajaj Boxer


उलझन तब होती है जब पैमाने बदलने पड़ते हैं। वो पैमाने जो हर हफ़्ते आने वाली कार या मोटरसाइकिलों को परखने के लिए इस्तेमाल होते हैं। कभी ताक़त की बात हो सकती है, तो कभी माइलेज और हैंडलिंग की। लेकिन हाल फ़िलहाल में सवारियों में फ़ीचर्स, पर्फोर्मेंस और रिफ़ाइनमेंट का ऐसा स्टैंडर्ड देखने को मिल रहा है, कि सभी सवारियों को एक ख़ास खाके में रखा जा सकता है, एक ही इंची-टेप से मापा जा सकता है । लेकिन ये बाइक ऐसी है जो आज कल की औसत प्रोडक्ट से बहुत अलग है। स्टाइलिंग पुरानी, फ़ीचर्स की लिस्ट छोटी और बनावट बहुत मोटी। बजाज की नई बॉक्सर। जो आई है पांच छह साल पुराने डिज़ाइन वाले हेडलैंप, चौड़ी सीटिंग, काम के बहुत थोड़े फ़ीचर्स के साथ । सीट के पीछे कैरियर । इसे देखकर एक सेकेंड के लिए राजदूत की याद आ गई । इसे लेकर सबसे बड़ा सरप्राइज़ तो यही है कि बजाज जो डेढ़ सौ सीसी के इलाक़े में पल्सर जैसी ट्रेंडी बाइक बनाती है वो ऐसी बाइक क्यों लेकर आई ?
.हर कंपनी के पास कुछ ऐसे प्रोडक्ट होते हैं दो फ़्लैगशिप प्रोडक्ट होते हैं। यानि ग्लैमरस, ख़ूबसूरत और नामी प्रोडक्ट जिसके बारे में चर्चा होती है और कंपनी का नाम होता है। वहीं कुछ ऐसी सवारियां होती हैं जो कंपनी की बिक्री के लिए बहुत ज़रूरी होती है , जो भले ही ग्लैमरस ना हों । और भले ही एक्सीड जैसी कोशिश फ़्लॉप रहे हैं लेकिन राजीव बजाज की ख़ूबी रही है कि वो आमतौर पर कुछ ना कुछ नया सोचते रहते हैं। और इसी सोच का नतीजा लग रही है बॉक्सर । 
इस बाइक को लेकर सभी बहस एक प्वाइंट पर आकर रुक से जाते हैं। वो प्वाइंट है इसकी क़ीमत। बजाज बॉक्सर जो डेढ़ सौ सीसी की एक बाइक है , उसकी क़ीमत है 42 हज़ार रु। दरअसल इसे देखने के लिए नज़र भी अलग चाहिए और यही क़ीमत इस बाइक को देखने के नज़रिए को बदल देती है।  


150 सीसी बाइक, जिसकी ताक़त लगभग 12 बीएचपी की और टॉर्क भी लगभग इतना ही। फ़िलहाल माइलेज का दावा है कि वो 55 से 60 किमी प्रतिलीटर है। इसकी राइड के बारे में, पर्फोर्मेंस के बारे में बहुत कुछ कहने के लिए नहीं, क्योंकि आमतौर पर बजाज की डेढ़ सौ सीसी पल्सर वाली तेज़ी या पकड़ नहीं दिखेगी, ठोस राइड है। 
कंपनी ने बॉक्सर के लिए कई विशेषण रखे हैं, जैसे दो पहियों पर एसयूवी और असल 'भारत बाइक' । इन सबका मतलब यही है कि इस मोटरसाइकिल का बाज़ार हैं उन जगहों पर जहां पर आम सड़क हैं टूटी-फूटी। उन ग्राहकों के बीच, जो मोटरसाइकिल का इस्तेमाल कॉलेज-ऑफिस के लिए ना करके, अपने काम के लिए करते हैं, यानि सामान लाने-ले जाने के लिए । और 42 हज़ार रू की क़ीमत बहुत ही आकर्षक कही जाएगी, इस बाज़ार और उस ग्राहक के लिए। जिस ग्राहक को बस काम से काम है, लाइफ़स्टाइल बाइकिंग से उसका कोई वास्ता नहीं है। 
हालांकि कुछ सालों पहले इस तरह की बाइक शहरों में दिखती थीं, लेकिन अब हर सेगमेंट के ग्राहक, यहां तक की सौ सीसी के ग्राहक भी थोड़े बहुत स्टाइल की उम्मीद करते हैं कंपनी से। तो ऐसे में बॉक्सर का लुक वाकई काफ़ी बेसिक है। क़ीमत को कम रखना वाकई बड़ी चुनौती है लेकिन अगर स्टाइल के मामले में ये थोड़ी और आकर्षक होती तो हो सकता है कि डेढ़ सौ सीसी की बॉक्सर आते ही सौ सीसी मोटरसाइकिलों का भी पसीना छुड़ा देती ।

November 08, 2011

फ़ॉर्मूला पर फ़साद ...WHY ???



फ़ॉर्मूला वन रेस को जब सामने से देखें तो सबसे पहले जिस चीज़ को आप महसूस करेंगे, जो आमतौर पर लोगों के रौंगटे खड़े कर देती है, वो है उन कारों की आवाज़। और कुछ चक्कर (जिसे एफ 1 की भाषा में लैप कहते हैं) के बाद जब आवाज़ की थोड़ी आदत हो जाए तो फिर नज़र जाती है उन बाईस कारों पर, जो एक जैसी, लेकिन बहुत तेज़ रफ़्तार में रेसट्रैक का चक्कर काटती भागती रहती हैं। अगर आप इस रेस को सिर्फ़ एक अजूबे की तरह देखने गए हैं तो फिर ये वो बिंदु होता है जिसके बाद से आपकी दिलचस्पी कम होने लगती है। आप इस रेस के पैटर्न को समझ कर, तेज़ आवाज़ की वजह से सरदर्द के साथ रेसट्रैक से बाहर जा सकते हैं। लेकिन अगर आप गए हैं, इस ईवेंट को एक नए खेल की तरह देखने के लिए। ये समझने के लिए कि आख़िर क्यों ये खेल दुनिया भर में सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेलों में टॉप पर है... क्या है ऐसा जो इसे सबसे महंगा बनाता है और क्या इसकी अहमियत है, तो कुछ बातें सामने आती हैं। जिनमें पश्चिमी संस्कृति के दो ख़ास पहलू भी हैं। एक तो है कांपिटिशन और दूसरा अनुशासन। कांपिटिशन ये कि कौन कितनी तेज़ कार बना सकता है और कौन इसे सबसे तेज़ भगा सकता है। लेकिन जो हिस्सा अजूबा लगता है वो है अनुशासन। वो अनुशासन जो कारों को तेज़, ड्राइवरों को संयमित और रेस को सुरक्षित बनाता है। कार, हेलमेट, रेसिंग के लिए कपड़े, टायर, कार की बॉडी और बेहद कड़े नियम, इन सबको तैयार करने के पीछे सिर्फ़ एक मक़सद कि कैसे इस रेस को ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षित बनाया जाए। मुझे ये उम्मीद थी कि इसी पहलू पर शायद लोगों की नज़र जाए, ट्रैक के अनुशासन का थोड़ा असर आम भारतीय सड़कों पर दुहराने की बात की जाए। भारत में इस रेस का आना, साफ़ है कि बढ़ते मार्केट और बिज़नेस की गुंजाईश की वजह से ही हुआ है, लेकिन है ये एक बड़ी विडंबना। सोचिए एक खेल, जिससे जुड़े हज़ारों लोग साल भर दो ही चीज़ों के बारे में सोचते हैं कि कैसे इन कारों को ज़्यादा से ज़्यादा तेज़ और सुरक्षित बनाया जाए, यही वजह कि कि 360 किमी की रफ़्तार में चलने वाली कारों के साथ भी पिछले 27 सालों से किसी की जान नहीं गई है, वो उस देश में आता है जहां पर दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं। एक लाख बीस हज़ार मौत सालाना। जिसकी चर्चा नहीं होती है, सरकारी मंत्रालयों, मीडिया या फिर ऑटोमोबील कंपनियों के द्वारा। ना तो सरकार लाइसेंस देने में कड़ाई की बात करती है, लाइसेंस जारी करने वाले आफ़िसों को दलालों से मुक्त कराती है और ना ही पैसे देकर लाइसेंस बनाने के ऊपर मीडिया का कोई स्टिंग ऑपरेशन होता है। क्योंकि ये किसी के लिए मुद्दा नहीं है। हालत ये है कि पिछले हफ़्ते मुंबई में एक शख़्स को लापरवाही से स्कूटर चलाने के आरोप में बंद कर दिया पुलिस ने, वो भी तब जब सड़क हादसे में उसकी मां की मृत्यु हो गई । दरअसल वो अपनी मां के साथ जा रहा था, सड़क के बीचोबीच गड्ढे की वजह से स्कूटर गिर गया, और मां की मौत हो गई। लेकिन इन सबके उलट बहस की अलग ही दिशा दिखी। तमाम तर्क सुनने को मिल रहे हैं इस खेल के ख़िलाफ़।

कुछ दिनों पहले तक फेसबुक पर कई ऐसे संदेश आ रहे थे आख़िर क्यों हो रहा है फ़ॉर्मूला वन भारत में और इससे किसका भला होगा। ग़रीबों का क्या भला होगा और किसानों का क्या भला होगा ? चूंकि ये सोच केवल कुछ आम हिंदुस्तानियों की नहीं थी। अचानक कई बौद्धिक भी इस खेल की आलोचना में उतर गए। बिना ये सोचे कि अगर एफ़-1 ग़रीबों और किसानों का भला करने लगेगा तो वो क्या करेंगे जिन्हें इस काम के लिए सरकार पैसे देती है। वो शायद भूल गए कि ये फ़ॉर्मूला वन, यूनाइटेड नेशन का उपक्रम नहीं है। कई क्रिकेट प्रेमियों को बर्नी एक्लेस्टन की वो बात बड़ी नागवार गुज़री कि भारत में एफ1 एक दिन क्रिकेट के बराबर लोकप्रिय हो जाएगा। वो लगे एफ 1 के मुखिया के बयान की धुलाई करने। सवाल तो ये भी उठता है कि आख़िर आईपीएल से कितने लोगों को रोज़गार मिलता है, क्रिकेट से कितने ग़रीबों का भला होता है। आईपीएल में तो शुरू में कुछ प्रतिभाशाली बालाओं की जगह भी थी, लेकिन अब तो वहां भी सभी विदेशी प्रतिभाएं नाचती दिखती हैं।
पता नहीं चल रहा है कि विरोध हो रहा है तो क्यों हो रहा है आख़िर भारत की किस परंपरा को ये चोट पहुंचा रहा है और किन मूल्यों का ह्रास हो रहा है इस खेल से जो सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि ऑटोमोबील टेक्नॉलजी की एक तरह से प्रयोगशाला भी है। यहां से निकलने वाली टेक्नॉलजी कमसेकम आने वाले समय में आम गाड़ियों में तो अपनाई जाती है। इस रेस केआयोजन में देश की इज़्ज़त दांव पर नहीं लगी थी, कमसेकम वैसे नहीं जैसे कॉमनवेल्थ या वर्ल्ड कप क्रिकेट पर थी, इसीलिए जब इसका सफल आयोजन हो भी गया तो उसका रिश्ता देश के गौरव से नहीं जोड़ा गया, बल्कि मोटरस्पोर्ट्स के लिए बढ़ते फैन्स की संख्या और प्राइवेट कंपनियों के प्रबंधन की कुशलता से जोड़ा गया। इस पर कोई दो राय नहीं कि ये बाज़ार है, रेस एक व्यापार है। लेकिन ये भी समझने वाली बात है कि स्पांसर भी उसी पर पैसे लगाते हैं जिसमें गुंजाईश होती है। खेल और बाज़ार के नाम पर तो और भी दुकान चल ही रही है, इसे भी चलने दीजिए। इससे कुछ सीखने को तो मिल रहा है। 

November 02, 2011

नंबर 1 फ़ॉर्मूला


(24-10 को लिखी रिपोर्ट)

खेल कभी खेल नहीं रह जाते हैं जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हों। कभी महायुद्ध बन जाता है, जैसा कुछ साल पहले तक होता था जब भारत-पाकिस्तान आमने सामने होते थे। या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नामी-बदनामी के लिए अहम ब्रांडिंग बन जाता है, जैसे पिछले साल हुए कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान हुआ था। और ऐसी ही कुछ कहानी है फ़ॉर्मूला वन की भी। जो मोटरस्पोर्ट्स के एक ईवेंट से कहीं ज़्यादा है, कहीं बड़ा बन चुका है। रफ़्तार, इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजी से बढ़कर ये मार्केटिंग, ब्रांडिंग, नेटवर्किंग से लेकर ग्लैमर और लाइफ़स्टाइल का ईवेंट बन चुका है। और ऐसे ही रफ़्तार के महाकुंभ का भारत एडिशन भी बन चुका है। इंडियन ग्रां-प्री। भारत का पहला फ़ॉर्मूला वन रेस।

आमतौर पर जैसा हमने देखा है वैसा ही इस रेस के साथ भी हुआ है भारत में। शुरूआत से ही कई विवाद रहे, उहापोह रहा और जब तक कि बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट का उद्घाटन नहीं हो गया, डर यही था कि कॉमनवेल्थ वाली किरकिरी ना हो जाए, एफ1 के साथ भी। इसके अलावा ग्रेटर नौएडा के किसानों का आंदोलन, ज़मीन अधिग्रहण को लेकर होने वाली मारामारी के बीच आशंका ये भी रही कि ये रेसट्रैक भी उस खींचतान के बीच आएगा। लेकिन अभी तक आयोजक ये भरोसा ज़रूर दिला रहे हैं कि उस विवाद का रेसट्रैक की ज़मीन से कोई लेना देना नहीं है।

ख़ैर मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों  के लिए तात्कालिक राहत की बात ये है कि रेसट्रैक तैयार है। दुनिया भर के चुनिंदा रेस ड्राइवरों के लिए तैयार है बुद्धा इंटरनैशनल रेस सर्किट...जहां पर भागने वाली हैं दुनिया की सबसे दमदार फ़ॉर्मूला वन कारें। जहां पर एक एक मोड़ पर होंगी सबकी नज़रें और कई किलोमीटर दूर तक सुनी जाएगी आवाज़ें , उन रेसिंग कारों की जो सबसे प्रतिष्ठित, सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेल का हिस्सा हैं। 30 अक्टूबर 2011 है वो तारीख़ जब दुनिया के सबसे तेज़ तर्रार 24 ड्राइवर पहली बार होंगे इकट्ठा दिल्ली से सटे ग्रेटर नौएडा में और सभी रेस करेंगे एक दूसरे से। 5 हज़ार मज़दूर, 300 इंजीनियर और चौबीसों घंटे चले काम ने तैयार किया है ये रेस सर्किट जो 350 हेक्टेयर में फैला है। और इन सबके लिए ख़र्च हुए हैं 2 हज़ार करोड़ रु। और इस रेस के लिए लगभग 6 हज़ार टन सामान आएगा।

5.14 किमी लंबे रेसट्रैक में कई ऐसे स्ट्रेच दिए गए हैं जहां पर ओवरटेकिंग करने की गुंजाइश है। वहीं इस सर्किट की एक ख़ासियत है इसका स्ट्रेट, जहां पर टॉप स्पीड जाएगी 318 किमी प्रतिघंटे की।
14 मीटर का एलिवेशन यानि चढ़ाई ...जो दुनिया में शायद ही कहीं और है। कई रेसर जिनमें भारत के पहले एफ़ 1 रेसर नरैन कार्तिकेयन शामिल हैं उनके मुताबिक बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट दुनिया के बेहतरीन ट्रैक में से एक होगा। भारत जैसे देश में फ़ॉर्मूला वन रेस की ज़रूरत को लेकर तमाम चर्चाएं चल रही हैं, जिसके पक्ष औऱ विपक्ष में हज़ारों दलीलें हवा में लहरा रही हैं, किसानों की ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर शक जताया जा रहा है, जिसमें मैं पार्टी नहीं हूं, मैंने ना तो इन पहलुओं पर ठीक से पढ़ाई की है और ना किसानों से जाकर बात की है। मुझे सिर्फ़ एक चीज़ फिलहाल नज़र आ रही है और वो है एफ़ 1 देखने का मौक़ा। अपने तमाम हाइप, ग्लैमर और मार्केटिंग के बीच एफ-1 के बीचोबीच एक ऐसी दुनिया है, जो सिर्फ़ रफ़्तार और रोमांच की है, जो ऐसी तेज़ी से चलती है कि सबकुछ पीछ छूट जाता है। और वो ऐसी आवाज़ निकालती जाती हैं जो जो ज़िंदगी भर के लिए दिमाग़ के मेमोरी कार्ड में छप जाता है।
www.ndtv.com/kranti
*Published last week




October 24, 2011

its (E)on...


तो पिछली बार की कहानी से आगे की बात आज करता हूं। वो इसलिए क्योंकि बीते हफ़्ते ह्युंडै ने अपनी ईयौन लौंच कर दी है, और हफ़्ता ख़त्म होने से पहले मुझे इस कार को उदयपुर में टेस्ट ड्राइव करने का भी मौक़ा मिला। जिसके बाद इस कार के सबसे चर्चित पहलू के बारे में और बारीकी से सोच पाया। पहले इसकी क़ीमत और फ़ीचर्स। ईयौन भारत में ह्युंडै की सबसे छोटी और सबसे सस्ती कार है। 814 सीसी के इंजिन वाली ईयौन के छह वेरिएंट आए हैं, 2 लाख 69 हज़ार रु से 3 लाख 71 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत के साथ। कई ऐसे फ़ीचर्स के साथ जो 800 सीसी सेगमेंट में आम नहीं हैं, जिनमें से एक लगा मुझे एडजस्टेबल स्टीयरिंग, बहुत आरामदेह आगे की सीटें। इसका आकार बड़ा है अपने सेगमेंट के हिसाब से। ह्युंडै की वैल्यू-फॉर-मनी डिज़ाइन के तरीके ने इस कार में कई प्रैक्टिकल जगहें भी निकाली है, डैश के ऊपर, बड़ा ग्लव-बॉक्स, पानी के बॉटल के लिए जगह वगैरह। लगेज स्पेस भी बेहतर लगेगी अपने सेगमेंट से। लेकिन उदयपुर से आबू रोड की तरफ़ हाइवे पर इसे लेकर निकला तो फिर याद आ गया कि इसमें लगा है 814 सीसी इंजिन, जिसकी ताक़त सिर्फ़ 55 बीएचपी की है। इसे लेकर मैं निकला था उदयपुर से आबू रोड पर। बहुत अच्छा-ख़ूबसूरत हाईवे लेकिन उल्टी दिशा से आने वाली गाड़ियों से भरी। लेकिन ज़्यादा दिक्कत नहीं रही क्योंकि ये कार आराम-आराम से रफ़्तार पकड़ती है और सौ की रफ़्तार तक जाते-जाते वक्त लगाती है, साफ़ था कि बनावट, ड्राइव और फ़ीचर्स इस कार को एक शहरी कार बनाते हैं, हाईवे की गाड़ी नहीं।


इस कार को ध्यान से देखकर, बारीकी से जांचकर ये लगा कि मीडिया में या ज़्यादातर पत्रकारों के बीच इस कार को लेकर जो धारणा थी वो सही नहीं थी। दरअसल इसके इंजिन क्षमता के ऊपर कुछ ज़्यादा ही ध्यान जा रहा था, जिसे देखकर ये सोचना बहुत स्वाभाविक था कि सभी इसकी तुलना मारुति 800 या ऑल्टो से होगी। और चूंकि मारुति 800 अब मेट्रो से निकल चुकी है, सब यही सोच रहे थे कि ईयौन आते ही खेल ख़त्म कर देगी ऑल्टो को। इसके पीछे ह्युंडै के डिज़ाइन और इंजीनियरिंग पर भरोसा भी था और साथ में ये सच्चाई भी कि ऑल्टो अब पुरानी हो चुकी है। लेकिन मुझे ये लगा कि ये तुलना थोड़ी ग़लत है। ईयौन ऑल्टो को पीटने के लिए नहीं बनी है, ऑल्टो ख़रीदने वालों की उम्मीदें और ज़रूरतें कुछ और होती है, वो वैल्यू फॉर मनी के पुजारी होते हैं।
अगर हम देखें ईयौन की क़ीमत तो पता चलेगा कि ये लगभग वही है जो मौजूदा सैंट्रो की है। इयौन आ रही है 2.69 से 3.71 लाख रु के दिल्ली, एक्सशोरूम क़ीमत में, और सैंट्रो आती है 2.80 से 3.95 लाख रु के बीच। और इस क़ीमत से ये समझना आसान है कि कंपनी कहीं ना कहीं इसे सैंट्रो के विकल्प के तौर पर देख रही है, जिसे भारत में आए अब 13 साल हो गए हैं। ऊपर से ईयौन की एआरएआई से मापी माइलेज भी 21.4 किमीप्रतिलीटर की आई है। यानि ईयोन एक तरीके से सैंट्रो की रिप्लेसमेंट हो सकती है, लेकिन कंपनी ने इस बात से इंकार किया है। कंपनी सैंट्रो को बंद नहीं कर रही है, और ये देखना दिलचस्प होगा कि जो ग्राहक हज़ार सीसी की सैंट्रो ख़रीदने निकलेंगे वो क्या 800 सीसी की ईयौन को लेना चाहेंगे ?

October 21, 2011

किधर गई Kizashi !!


हाल ही में उदयपुर गया था...ईयौन के टेस्ट ड्राइव पर..और उदयपुर से आबू रोड पर ड्राइव करते हुए एक और कार की याद आई ...जिसे इसी रूट पर चलाया था...और फिर सोचा कि कहां गई वो कार...फिर खोज कर निकाला मैंने जो उस कार के बारे में पहले पहल लिखा था...वही शेयर कर रहा हूं...




सबसे महंगी मारुति
दिल्ली से उड़ते वक्त ही लगा कि ये फ़्लाइट कोई आम फ़्लाइट नहीं होने वाली है। पहले तो जेट -लेट फिर जब उदयपुर पहुंचे तो फिर हमें लटका दिया गया झीलों के इस शहर के आसमान मेंक्योंकि कोई वीवीआईपी उड़ान भरने वाले हैं...पायलेट ने बताया हवा में लटकने से ईंधन ख़त्म होने वाला है तो तेल भराने हम अहमदाबाद पहुंचे और फिर उतरे उदयपुर । और इन सबके बाद लगा कि फ़्लाइट कैसे आम हो सकती थी जबकि जिस कार को चलाने हम पहुंचे थे वो इतनी ख़ास थी।
जिस कंपनी ने हिंदुस्तानियों को पहली पीपल्स कार दीकार रखना और ना जाने कितनों को (जिनमें मैं भी शामिल हूंकार चलाना सिखाया...जो किफ़ायती और पैसा वसूल कार बनाने के लिए जानी जाती है। वो लेकर आ रही है एक लग्ज़री कारयानि मैं चलाने वाला था सबसे महंगी मारुति। जिसका नाम है किज़ाशी।
पहली बार किज़ाशी को कई ऑटो एक्स्पो पहले देखा थातब एक कौसेंप्ट कार थी। पिछले साल के एक्स्पो में एक ख़ूबसूरत कार बन कर तैयार खड़ी दिखी। और उदयपुर से माऊंट आबू की तरफ़ जाती सड़क पर मेरी पहली किज़ाशी ड्राइव हुई। ख़ूबसूरती और डिज़ाइन में काफ़ी आकर्षक लगी किज़ाशी। आकर्षकआरामदेहख़ूब जगह से साथये मस्ती भर ड्राइव भी महसूस करवा रही थी। पहले मैंने मैन्युअल ट्रांसमिशन वाली किज़ाशी चलाई और फिर आटोमैटिक। मैन्युअल बेहतर लगी। धीरे धीरे कार ने रंग पकड़ा और लगा कि तेज़ रफ़्तार मेंमोड़ पर और घुमावदार रास्तों पर बहुत संतुलन और पकड़ के साथ भाग रही थी। ड्राइव हल्की थी लेकिन विश्वास के साथ। कार वैसे बड़ी भी हैकई फ़ीचर्स भी हैंसेफ़्टी से लेकर आराम के। लेकिन उन मामलों में कोई क्रांतिकारी नयापन नहीं लगेगा। मेरे लिए सबसे दिलचस्प बात एक ही थी वो ये कि कार मारुति सुज़ुकी की है।
कंपनी ने जिस तरीके से जिस सेगमेंट में कार को पेश करने की बात की हैयानि क़ीमत और पोज़िशनिंग के हिसाब से। वो काफ़ी पेचीदा मामला है। पहले तो इसमें 2400 सीसी का इंजिन हैजो कैम्री औऱ अकॉर्ड जैसी कारों में लगे इंजिन के बराबर है। फिर ये एक सीबीयू होगीयानि पूरी तरह से बनी बनाई इंपोर्ट होती है। और जो कारें पूरी बनी इंपोर्ट होती हैं उन पर कस्टम ड्यूटी 110 फीसदी के आसपास होता है। यानि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में जो क़ीमत है उससे दुगनी। तो फिर क़ीमत के हिसाब से भी कैम्री और अकॉर्ड जैसी। फ़िलहाल अंदाज़ा 16-19 लाख रु का लगाया जा रहा है। लेकिन इंजिन और क़ीमत के अलावा दो मुद्दे और भी हैं। एक तो इसका साइज़बनावट और फ़ीचर्स । किज़ाशी उन दोनों कारों से छोटी है और इसे देखकर लगता है कि ये हौंडा सिविककोरोला आल्टिस और शेवरले क्रूज़ के सेगमेंट में ज़्यादा बेहतर तरीके से फिट होती है । तो थोड़ा तकनीकी कन्फ़्यूज़न इसका था। लेकिन इसके साथ और सवाल है जो इन सब पर भारी है...वो ये कि क्या हिंदुस्तानी ग्राहक मारुति कार के लिए इतने पैसे देंगे
?कई सालों पहले एक सीरीज़ शुरू की थी हमने...कूल करियरजिसके एक एपिसोड के लिए मैं मिला फ़ैशन डिज़ाइनर रवि बजाज से। बात निकलते-निकलते डिजाइनर कपड़ों की क़ीमतों पर पहुंची तो उन्होंने कहा कि इस डिज़ाइनर इलाक़े में या कहें ऐसे प्रीमियम वाले मार्केट में इमेज बड़ी ख़ास चीज़ होती है और उसी हिसाब से क़ीमत भी। कोई भी डिज़ाइनर पहले सस्ते कपड़ों का रेंज नहीं लाता है। पहले मंहगे से शुरू करता है और बाद में कभी सस्ता रेंज । नहीं तो ब्रांडिंग वैसी नहीं बनेगीएक्सक्लूसिविटी कहां से आएगी। कारों का ये सेगमेंट भी मुझे ऐसा ही लगता है। इस सेगमेंट के ग्राहक केवल लग्ज़री कार से ज़्यादा ख़रीदते हैं एक इमेज और एक स्टेटमेंट को। और अभी तक के गुणा-भाग में ये मुश्किल लग रहा है मारुति के लिए किज़ाशी के साथ।
* Published
(वैसे आपको बता दूं कि पिछले महीने 14 किज़ाशी बिकी थी)

The Curious Case of Pratap Singh Thakur ;)


एनडीटीवी के प्रताप सिंह ठाकुर ने देश की सबसे नामी रैली रेड-डी-हिमालया में जीत हासिल की है। प्रताप, अपने नैविगेटर अमित गोसाईं के साथ स्टॉक कार, एक्सपर्ट कैटगरी में पहले पोज़ीशन पर रहे। 13वीं रेड डी हिमालया रैली के तहत इस साल 6 दिन में 2000 किमी का सफ़र तय करना था, जिस दूरी को छह लेग में बांटा गया था। शिमला से शुरू होकर, मंडी, चंबा होते हुए रैली जम्मू कश्मीर में जाती है और द्रास, करगिल के रास्ते हिमालय की गोद में दौड़ने वाली इस रैली को देश की सबसे मुश्किल रैली कहा जाता है। इस साल एक्सट्रीम और एडवेंचर कैटेगरी के लिए दो रुट तय किए गए थे, जिसकी शुरूआत 11 अक्टूबर को हुई थी। इस रैली में कुल पांच कैटेगरी होती है एक्स्ट्रीम कैटेगरी में दो कारों और एक बाइक्स की रैली होती है, वहीं एसयूवी और कारों के लिए एडवेंचर ट्रायल रेस होती है। एक्सट्रीम कैटगरी में सुरेश राणा और अश्विन नाइक की जोड़ी ने जीत हासिल की।

October 10, 2011

5 डबल ओह ( हिंदी में )



जब ज़रूरत पूरी हो जाती है तब शौक की शुरूआत होती है। ये बात इस बार दोनों पार्टियों पर लागू हो रही है।ग्राहकों पर भी और कंपनी पर भी। महिंद्रा, एक ऐसी गाड़ी कंपनी थी जिसकी गाड़ियां थीं तो बहुत नामी लेकिन वो नाम था ऑफ़रोडर गाड़ियों की वजह है, यानि ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलने वाली ठोस सवारी। फिर कंपनी को फिर ज़रूरत थी एक अर्बन, शहरी एसयूवी की, यानि स्कोर्पियो की। और उसे कंपनी ने बख़ूबी पूरा किया, अपनी पहचान बदलने के लिए। और अब कंपनी कुछ शौकीनों के ज़रिए अपने शौक पूरे कर रही है। नई XUV 500 लाकर। वहीं ग्राहक हो रहे हैं शौकीन नई एसयूवी के। ख़ैर। महिंद्रा ग्लोबल बाज़ार के लिए लेकर आई है अपनी नई XUV । तमाम नए फ़ीचर्स, आकार और इंजीनियरिंग का इस्तेमाल, और धनबाद से लेकर न्यूयॉर्क तक के ग्राहकों के लिए, जो विदेशी गाड़ियों में लगभग स्टैंडर्ड हो गए हैं। जैसे ESP , जो गाड़ी की स्टेबिलिटी बनाए रखता है। वहीं ABS है EBD के साथ। हिल डिसेंट कंट्रोल भी है, मुश्किल ढलानों से आराम से उतरने के लिए। यानि मुश्किल हालात में संतुलन और पकड़ बनाने के लिए तमाम इंतज़ाम कर दिए हैं कंपनी ने इसमें। साथ में मोनोकॉक डिज़ाइन। यानि कार की बॉडी अलग अलग हिस्सों में ना बन कर एक ही बार में बनती है। इसमें लगा इंजिन जाना पहचाना है, एम-हॉक सीरीज़ का 2.2 लीटर इंजिन, जिससे ताक़त 140 हॉर्सपावर की मिलती है।

महिंद्रा लगभग 4 सालों से इस एसयूवी पर काम कर रही थी। जिससे वो दुनिया भर में एक मल्टीटैलेंटेड एसयूवी बनाने वाली कंपनी के तौर पर पहचानी जाए। और आख़िरकार वही सवारी आई है, जिसके लिए कंपनी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। नाम भी इसका ऐसा ही चुन कर रखा है, जिसमें एक्स और 5 को कंपनी अपने लिए लकी मानती है।
फ़िलहाल क़ीमत इनविटेशनल है, यानि लुभाने के लिए, यानि कुछ महीनों के लिए। दिल्ली में इसकी एक्स शोरूम क़ीमत 10 लाख 80 हज़ार से 12 लाख 88 हज़ार के बीच। यानि रोड टैक्स वगैरह लगाने के बाद भी इसकी ऑनरोड क़ीमत ज़रूर ऐसी होगी जो परेशान करेगी टाटा आरिया जैसी गाड़ियों को बल्कि उन सभी गाड़ियों को जो इस क़ीमत में आ रही हैं।
हालांकि महिंद्रा की स्कोर्पियो हिट तो बहुत है लेकिन कई लोगों से इसके अंदर की जगह की शिकायत ज़रूर सुनने को मिलता है। इस नई एसयूवी के साथ वो शिकायत ज़रूर दूर हो गई है। लेकिन कंपनी कह रही  है कि वो एक्सयूवी से बड़ी एसयूवी नहीं बनाएगी, क्योंकि वो इलाका महिंद्रा अपनी कोरियन कंपनी सैंगयौंग के लिए छोड़ रही है जो पहले ही अपनी एसयूवी के लिए जानी जाती है। इस सेगमेंट इस एंट्री ने वाकई हलचल मचाई है क्योंकि एसयूवी का बाज़ार लगातार बढ़ा है भारत में, और 10 से 16-17 लाख रू वाले सेगमेंट में एसयूवी ना के बराबर हैं, टाटा आरिया को छोड़कर। वहीं ये सफ़ारी और स्कोर्पियो वाले सेगमेंट से भी कुछ ग्राहकों को भी खींच लेगी क्योंकि उस सेगमेंट में लंबे समय से ग्राहक कुछ नए का इंतज़ार कर रहे हैं। जिसमें सबसे ज़्यादा इंतज़ार दो ही गाड़ियों का हो रहा था, एक तो आ ही गई और दूसरी जिसका अभी तक टेस्ट ही चल रहा है, टाटा की नई सफ़ारी मर्लिन का। जिसकी तस्वीर उम्मीद है कुछ हफ़्तों में साफ़ हो जाएगी और 2012 की शुरुआत तक आ जाएगी। और आने वाले मई तक ये दोनों गाड़ियां बहुत मस्त भागेंगी, क्योंकि उसके बाद इसी सेगमेंट में रेनॉ की डस्टर आएगी, जिसकी क़ीमत का अंदाज़ा काफ़ी कम लगाया जा रहा है। तो देखते हैं सस्ती स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल का स्पोर्ट कितना रोमांचक होता है।

*Already Published  

October 02, 2011

No Surprise Syndrome ...


भूमिका पार्ट-1: चकित होने का भाव कैसे आता है ? मेरे हिसाब से ये प्रोसेस कुछ ऐसा होता है...मन को कुछ अच्छा लगता है, जिसे वो चुनता है और फिर उस चाकित्य के विषय के बारे में दिमाग़ जानकारियां इकट्ठा करने लगता है, और विषय की जटिलता और सादगी के आयाम को जोख कर मेरे चकित होने की इंटेसिटी तय होती है। शायद ऐसा ही कुछ होता है। 
मेरे लिए क्यों अहम है, आप अगर ये सवाल करें, तो मैं कहूंगा कि हम सबके लिए है। एक संवेदना जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए काफ़ी ज़रूरी है, मुझे लगता है कि ये हमें अपने अंदर के बच्चे को जगाए रखने में मदद करता है, मन फ्रेश रहता है । और इसी सोच से तय एजेंडा के तहत हर दिन नई-नई चीज़ों से चकित होता रहता हूं, कई बार बलधकेल कई बार अनायास। 

भूमिका पार्ट-2: ईमानदारी से कहूं गाड़ियों की दुनिया से इतने साल से जुड़ा हूं, लेकिन हाल-फ़िलहाल में नई गाडियों को देखकर चकित होने की फ्रीक्वेंसी मेरी काफ़ी कम होती जा रही थी। जिस पर पहला रिएक्शन तो मेरा ये था कि उम्र जब तीस पार हो जाती है तो मन का सीपीयू स्लो हो जाता है। हो सकता है ऐसा हुआ हो, लेकिन एक और बड़ी वजह लगी बाद में ( यक़ीन मानिए उम्र को झुठलाने के लिए बहाना नही है ये) । 
आज की तारीख़ में जब हम नई गाड़ी की बात करते हैं तो उसके नएपन का पैमाना क्या होता है। दरअसल पैमाने और नमूने में बहुत दूरी नहीं होती। जैसे पिछले मॉडल और नए मॉडल के बीच में नएपन का भेद। पिछले का फ्रंट ग्रिल टेढ़ा था, तो नए का मेढ़ा। पुराना स्टीयरिंग षटकोणीय था तो नया अष्टावक्र। पिछले की माइलेज 16.00000 थी तो नया मॉडल दे रहा है 16.0547579 किमी प्रति लीटर। और बीएचपी में 0.6789 का अभूतपूर्व उछाल। इस कार में सीट 56 एंगिल से मुड़ती है तो पिछले मे 32 एंगिल से । पहले 2 एयरबैग अब 90 एयरबैग, पहले सीट पर मसाज की सुविधा थी तो इस मॉडल में आपकी पीठ खुजलाने की भी सुविधा है। मोटरसाइकिलों में तो पूछिए ही मत। कंपनियों की माने तो हर एक नए स्टिकर से बाइक की माइलेज दुगनी और रफ़्तार तिगुनी होती जा रही है। बदलाव के नाम पर स्टिकर्स, कुछ और स्टिकर्स, जगह बच गई तो फ़ेयरिंग, एलईडी लाइट, मेंहदी, चंदन का लेप और थोड़ा आंवला। अद्भुत। 
ईमानदारी से कहूं कि इन सब का लेखाजोखा देते हुए ख़ुद को ऑटोमोबील पत्रकार से ज़्यादा मुनीम महसूस करता हूं। और ये एक बड़ी वजह है नो-सरप्राइज़ सिंड्रोम की। सालों से गाड़ियों की दुनिया में हम इंप्रोवाइज़ेशन देख रहे हैं, क्रांतिकारी इंवेशन नहीं। और भारत में तो इस असेंबली लाइन मानसिकता आजकल कुछ ज़्यादा ही दिख रही है।

मुद्दा : हुआ यों कि मैं पहुंचा हुआ था मर्सेडीज़ के म्यूज़ियम में । वहां पर खड़ी थी दुनिया की पहली ऑटोमोबील। सवा सौ साल पहले कैसी गाड़ी बनी थी ये देखकर चकित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था मेरे पास। गोटलीब डेमलर और कार्ल बेंज़ की बनाई गाड़ियों को देखकर मज़ा आता है, पहली नज़र में लगता है कि कोई छोटी बग्घी है जिसके घोड़े कहीं बांधे गए हैं। इंजिन का आकार इतना बड़ा, स्टीयरिंग की जगह। सबकुछ मज़ेदार। 
साथ में ये जानना कि दुनिया की पहली लॉरी जब तैयार की थी डेमलर कंपनी ने तो उसका काम क्या था। जो तस्वीर थी वो तो बता रही थी बियर का ट्रांसपोर्टेशन । जिसे देखकर अचानक मौजूद सभी लोगो में ताज़गी की लहर दौड़ गई । 
फिर चकित हुआ उस मड फ़्लैप को देखकर जो कि लगी थी एक कार में पहली बार। जिससे कि पहिए से कीचड़ उछलकर ना लगे। वहीं मौजूद जर्मन कैमरापर्सन जिसका नाम था हैरल्ड उसने बड़ी दिलचस्प बात बताई, जर्मन अभी भी मडफ़्लैप के लिए जो शब्द इस्तेमाल करते हैं उसका मतलब है घोड़े की लीद से बचाने वाली पट्टी । 
इस म्यूज़ियम में घूम कर लगा कि गाड़ियों के बारे में हम जैसा सोचते हैं, महसूस करते हैं वो किसी आम यूरोपियन से कितना अलग होता है। क्योंकि कुछ राजा-महाराजाओं को छोड़ दें तो ज़्यादातर हिंदुस्तानियों के लिए कार उनके सेंसिबिलिटी का हिस्सा बनी एंबैसेडर, फ़िएट और मारुति 800 के बाद। जिनमें से तीनों अपने शाश्वत रंग-रूप में जैसी थीं वैसी ही रहीं। जबकि यूरोप में लोगों ने कारों को एक एक क़दम बढ़ाते देखा है। बड़ी से बड़ी चीज़ें जैसे इंजिन और सुरक्षा से लेकर छोटे-छोटे बदलाव, लैंप और मडफ़्लैप तक। और ये किसी भी कुंठा के तहत की गई तुलना नहीं थी, एक ऑब्ज़र्वेशन था, क्योंकि हमने गाड़ियों के विकास का एक दूसरा ही साइकिल देखा है। 
इन्हीं सभी गाड़ियों को देखते हुए एक वक्त ऐसा आया जब मन में सेकेंड के आधे हिस्से में ही गाड़ियों के सवा सौ साल के सफ़र की पूरी फ़िल्म गुज़र जाती है। तमाम रोल्स, मर्सेडीज़, फेरारी और नैनो, सामने से आकर निकल जाते हैं, बताते हुए कि हमने एक लंबा सफ़र तय किया है, लंबी कहानी है ये, लेकिन पिक्चर अभी बाकी है। 

*Published

October 01, 2011

Ohhh its XUV500 (double Oh) !!

कुछ बेसिक जानकारियां महिंद्रा XUV 500 के बारे में ......

2.2litre mHawk diesel engine 

140bhp with 330Nm torque

6-speed transmission 

0-60kmph in 5.4 seconds

15.1 kms per litre (ARAI-certified).

W6- Rs.10.80 Lacs

W8 -Rs.11.95 Lacs 2WD model 

 W8 All Wheel Drive (AWD) Rs.12.88 Lacs


3 variants & 7 shades 


September 30, 2011

Hyundai Opens 'EON' bookings

News from Hyundai 

Hyundai Motor India Ltd (HMIL), announced the commencement of bookings of its soon to be launched new compact car – EON. The bookings will open from October 1, 2011The car will be manufactured in India at Hyundai Motor India's manufacturing facility located at Sriperumbudur near Chennai.

The EON will bear Hyundai's latest design philosophy of 'Fluidic Sculpture'.  EON has design elements and features that have been specifically developed for Indian conditions. The car has been designed at Hyundai's Namyang R&D centre located in the Gyeonggi Province in South Korea. The customers can book EON through sending SMS HYUNDAI <space> EON to 53456 or visit the Hyundai dealership or log on to www.eonindiaon.com for registrations. 


September 29, 2011

Kranti Sambhav - NDTV Social

Kranti Sambhav - NDTV Social

ROYAL ENFIELD- CLASSIC CHROME & DESERT STORM





News from Royal Enfield : 
Royal Enfield Launches Chrome and Desert Storm

RE Classic Chrome- Rs 1,50,659

RE Desert Storm-  Rs 1,43,967
(Ex- Showroom Mumbai)



Classic Chrome retains the  styling with the chrome tanks, wide mud guards and oval tool box, apart from the distinguishing tiger lamps that Royal
Enfield bikes are famed for. The single spring saddle seat, the unique tail lamp, the Royal Enfield emblems on the engine and even the font on the speedometer are all inspired by the original styling of the 1950's. artistic paintwork on the tank, 500cc, TwinSpark, unit construction engine,27.2 bhp power


Desert Storm The Desert Storm draws inspiration from the World War era, with sand colour scheme. matt finish paint job, the Royal Enfield monogram on the tank and the thigh pads.The Desert Storm is also equipped with all the technical features of the Classic Chrome like the wide mud guards, oval tool box, the signature Royal Enfield tiger lamps, single spring saddle seat and the unique tail lamp. It comes fitted with the 500cc TwinSpark, unit construction engine and the 27.2 bhp power output is made available with the Electronic Fuel Injection system.

September 28, 2011

Brio Bio-Data



Honda Brio (Ex Showroom New Delhi)
Variant 'E'- Rs 3.95 lakhs
Variant 'S'- Rs 4.35 lakhs
Variant 'S (O)'- Rs 4.90 lakhs
Variant 'V'- Rs 5.10 lakhs


Honda Siel Cars India launched its Brio (pronounced as Br-ee-o and means "energetic" and "cheerful" in Italian),
four cylinder 1.2-litre i-VTEC engine that delivers maximum output of 88 PS @ 6000 rpm and Torque of 109 Nm (11.2 kg-m) @ 4600 rpm, while giving fuel economy of 18.4 km/l, as per test data.
Brio is available in 5-speed manual transmission
3610 mm long, 1680 mm wide and 1500 mm tall with a wheelbase at 2345 mm
small turning radius of only 4.5m helps make the Brio extremely easy to drive in congested city traffic environment.

G-CON (G-Force Control Technology, the Brio's body makes extensive use of high tensile steel in key areas of the frame. Dampers, Trailing arms and Rear hatch area
dual SRS front airbags, Anti-Lock Brake System (ABS) which prevents wheel locking, Electronic Brake Distribution (EBD) which enhances braking performance, front pretensioner seat belts that pre-emptively tighten the belt to prevent the occupant from jerking forward in a crash and impact-mitigating headrests.
latest technology i-SRS airbag system with continuously staged inflation which can accommodate a broad range of occupant positions and potential collision situations.

four variants – EMT, SMT, S(O)MT and VMT
six exterior colours - Energetic Blue, Rallye Red, Urban Titanium, Alabaster Silver, Taffeta White and Crystal Black Pearl
 
The Honda Brio comes with a 2 years or 40,000 kms warranty as standard value for all customers.

Ashok Leyland's DOST

Ashok Leyland enters the Light Vehicle segment, Launches DOST, starting at Rs. 3.79 Lakhs.  
Ashok Leyland, the Hinduja Group flagship, today commercially launched in Maharashtra DOST in India's fast expanding LCV segment, first vehicle to be launched from its Joint Venture with Nissan Motor Company...priced at Rs. 3.79 lakhs to Rs. 4.37 lakhs (ex-showroom – Mumbai)

Nissan's New Sunny

सनी के बारे में सिर्फ़ जानकारी बांट रहा हूं, राय नहीं।


Petrol
Grade
XE
XL
XV
Ex- Showroom New DelhiPrice
578,000
688,000
768,000











Nissan Motor India Private Ltd launched Sedan Nissan SUNNY at 
Nissan SUNNY manufactured on the consummate V-platform will be available in the domestic market from the beginning of October, 2011. Available at 45 Nissan dealerships across the country, the Sedan can be booked from September 21, 2011 and the delivery would start from October 03, 2011. The SUNNY with a 16.95 kmpl of fuel economy (ARAI certified) will be available to customers across the country without any waiting period for delivery.


4-cylinder 1.5-liter double overhead camshaft petrol engine from Nissan
99 PS of power @ 6000 rpm
a maximum torque of 134 Nm @ 4000 rpm
five speed manual transmission, 
the SUNNY delivers a fuel efficiency of 16.95 kmpl of petrol.




SUNNY is Available in Bronze Grey, Blade Silver, Storm White, Sapphire Blue, Onyx Black and Brick Red colours, all three variants of SUNNY - base XE, mid XL and high XV – will have safety features such as Anti-Lock Breaking System (ABS), Electronic Break-force Distribution (EBD), Break Assist (BA), Engine Immobilizer and Airbags.Departing from the industry practice, Nissan has adopted a uniform pricing policy across the country to offer a fair and equitable benefit to customers all over India. Thus, the ex-showroom prices will be uniform across India except for variance in VAT, Entry Tax, Octroi and other local taxes levied by the states/cities.


The Nissan SUNNY name was first used in 1966 on a compact sedan sold in Japan and was given its cheerful name by the Japanese people from more than 8 million entries in a special naming competition. 
The Nissan SUNNY name was first used in 1966 on a compact sedan sold in Japan and was given its cheerful name by the Japanese people from more than 8 million entries in a special naming competition. 




Over the next four and a half decades, there have been nine generations of SUNNY models with total sales of more than 16 million units to 140 countries.However, the new 10th generation SUNNY Sedan is the first SUNNY to hit the Indian roads.


September 27, 2011

क्यों बदनाम होती है सिर्फ़ SUPERBIKE ???


न्यूज़ की दुनिया सालों गुज़ारने पर कई विडंबनाएं देखने को मिलती हैं, जिनमें से एक मौत भी है। कई बार ख़बरों की महत्ता तय होती है किसी दुर्घटना में मरने वालों की संख्या से या फिर सवारी से, यानि प्लेन क्रैश प्रायोरिटी, हेलिकॉप्टर क्रैश सेकेंड प्रायोरिटी फिर ट्रेन, बस वगैरह। लेकिन ये कोई थंबरूल नहीं है, परम सत्य नहीं है।
भारत में लगभग सवा लाख लोग अपनी जान सड़कों पर गंवा देते हैं। चलते हुए, साइकिल पर, बाइक पर या कारों में। लेकिन वो सिर्फ आंकड़ों में तब्दील हो जाते हैं, जहां पर किसी इंसान का चेहरा नहीं, कुछ नंबर दिखाई देते हैं। और ये नंबर भी दब जाते हैं अगर किसी प्लेन क्रैश में 6 लोगों के मरने की ख़बर आ जाए। यानि अंत के बाद भी इंसान फंसा रहता है क्लास स्ट्रगल में। यानि ये तो ज़ाहिर सी बात है कि प्लेन में उड़ने वाला कोई ना बैठा बड़ा आदमी ही होगा और लोगों को उसके बारे में जानने में ज़्यादा दिलचस्पी होगी, बजाय उस ऐटलस साइकिल पर चलने वाले अधेड़ आदमी के जो एनएच 24 पर ट्रक के नीचे आ गया है। लेकिन इस विडंबना का वास्ता सिर्फ़ क्लास डिफ़रेंस या समाजशास्त्र से है, ये अधूरी बात है। दरअसल इस दिलचस्पी की एक वजह स्वाभाविक इंसानी साइकोलजी भी है, जिसे सनसनीखेज़ रस कह सकते हैं। जब मौत की वजह से ज़्यादा बड़ा और सनसनीखेज़, मौत का तरीका हो जाता है। वो कितना क्रूर, नाटकीय रहा या वीभत्स रहा ये जानने की दबी सी उत्सुकता भी लोगों को इन ख़बरों की तरफ़ भी खींचती है। भूकंप और बाढ़ में हुई मौत एक त्रासदी होती है, सड़क हादसे किसी आम हिंदुस्तानी के मरने को उसका प्रारब्ध मान लिया जाता है लेकिन एरो शो में पायलट की मौत एक विज़ुअल घटना हो जाती है, अपने मंगेतर के साथ मिलकर एक प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी की हत्या एक ईवेंट बन जाता है। जहां मारे गए नीरज ग्रोवर के मौत के ज़िक्र से ज़्यादा बड़ी जिरह हो जाती है कि प्रेमिका ने उसके शरीर के कितने टुकड़े किए, जिस पर ज़्यादा रौशनी डालने के लिए राम गोपाल वर्मा को फ़िल्म बनानी पड़ती है (जिसका प्रोमो उसी दिन लौंच होता है जिस दिन केस का फ़ैसला आने वाला था)
कुल मिलाकर ऐसा ही कुछ होता है जब कहीं भी कोई सुपरबाइक क्रैश करती है। एक तो आम सोच में सुपरबाइक शब्द ही लार्जर देन लाइफ़ होता है, सुपर मैन की तरह सुपरबाइक। और साथ में उस रफ़्तार पर क्रैश जिसके बारे में ज़्यादातर पॉपूलेशन केवल कल्पना कर सकती है, क्योंकि ज़िदगी भर ज़मीन पर ऐसी रफ़्तार या ऐक्सिलिरेशन तो उन्होंने कभी महसूस नहीं किया होगा। और फिर शुद्ध भारतीय सवाल कि शौक के लिए कोई अपनी जान कैसे जोखिम में डाल सकता है ? हां, ब्लू लाइन के नीचे आना या मुंबई की लोकल से बाहर गिरना, या फिर बिजली से चलने वाली ट्रेन की छत से टपकना तो फिर भी मान्य है। इसीलिए जब सुपरबाइक्स गिरती हैं, सोशियोलॉजिस्ट जग जाते हैं, सेफ़्टी एक्सपर्ट आस्तीन चढ़ा लेते हैं और कंप्यूटर के कीबोर्ड घिसे जाने लगते हैं। बड़ी शिद्दत से एक ही कन्क्लूज़न निकाला जाता है कि सुपरबाइक्स बहुत ख़तरनाक हैं। और इस डिबेट में भी क्लास-चर्चा तो आ ही जाती है, क्योंकि अगर किसी दुपहिए की क़ीमत 12 से 15 लाख की हो तो फिर किसी ना किसी बड़े आदमी के बच्चे ने ही वो बाइक ख़रीदी होगी, ज़ाहिर है ऐसे चुनिंदा शौकीन पैसेवाले ही होंगे। और उस क्लास की रिपोर्टिंग तो लाज़िमी है।
ख़ैर इन ख़बरों पर कवरेज को लेकर जो भी प्रोब्लेम मुझे लगे लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूरी हालत बुरी है। सुपरबाइक्स को लेकर हिंदुस्तान में किसी तरीके की कोई जागरुकता नहीं है। और ये सरकार से लेकर आम लोगों तक में है। जिस वजह से बिना जाने-समझे पहले तो सुपरबाइक भारत में लाए गए, फिर बेचे गए और अब आलोचना का शिकार हो रहे हैं। आख़िर क्या कमी रही है अब तक इस तरह के बाइक्स के कल्चर में, जिसे लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भी कहते हैं...
सुपरबाइक्स के लिए कोई रेगुलर ट्रेनिंग की व्यवस्था भारत में नहीं है जिससे देश के सभी इलाके के राइडर सीख पाएं, सुपरबाइक चलाना। कुछ कंपनी दे रही हैं, लेकिन ये मोटरसाइकिलें क्रैश-कोर्स से नहीं सीखी जा सकती हैं...
भारत में सेफ़्टी को लेकर अब तक कोई कल्चर नहीं रहा है। दिल्ली में तो हेलमेट को लेकर एक कड़ाई देखी भी गई, देश के बाकी हिस्सों में हेलमेट तभी निकलते हैं जब कड़े ट्रैफिक कमिश्नर की पोस्टिंग होती है। और इन बड़ी बाइक्स के लिए बहुत ज़रूरी, ग्लव्स और राइडिंग गियर को तो भूल जाइए।
मां-बाप क्यों अपने बच्चों को बिना सेफ़्टी का संदेश दिए, मानो वो बच्चों के बंदूक दे रहे हैं, लेकिन ख़तरनाक बात ये कि ये खिलौना वाला नहीं असल गन है। केवल अफ़ोर्ड करना इकलौता क्राइटीरिया नहीं हो सकता है आपके गिफ़्ट के लिए। 

लेकिन इन सबके अलावा एक और मुद्दा है जो सबसे ख़तरनाक है। भारत में जो स्पोर्ट्स बाइक आईं वो सीधे 1000 सीसी वाली आईं। जिनकी आमतौर पर ताक़त 180 हॉर्सपावर के पास होती है। और ये इतनी तेज़ भागती है जिसका सही अंदाज़ा सालों के प्रैक्टिस के बाद ही हो सकता है। सरकार ने दरअसल 800 सीसी से ऊपर की मोटरसाइकिलों पर से कस्टम ड्यूटी कम किय था, अमेरिका को ख़ुश करने के लिए, जिससे हार्ली डेविडसन को भारत में आसान एंट्री मिले। होना ये चाहिए था कि 250 से 400 से 600 सीसी के इंजिन आते जिस पर बाइकर प्रैक्टिस कर पाते। लेकिन हुआ उल्टा पहले हज़ार सीसी की मोटरसाइकिलें आई हैं और बाद में 250 सीसी वाली। और अलग अलग स्टेज की बाइक्स चलाए बिना कई नौजवान सीधे बड़ी सुपरबाइक्स पर चढ़े, क्योंकि ज़्यादातक मां-बाप को भी नहीं पता था कि ये सुपरबाइक्स मज़ेदार तभी होती है, जब आपने इसे चलाना सीखा हो।
दुनिया के कई देशों में लाइसेंस इंजिन की क्षमता के हिसाब से मिलते हैं। यानि हौंडा ऐक्टिवा के लिए अलग लाइसेंस और हौंडा सीबीआर 1000 के लिए अलग लाइसेंस। लेकिन भारत में सरकार ने उन बाइक्स को आने की इजाज़त दे दी है, लेकिन लाइसेंस के सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया है।
कुल मिलाकर आम राइडर से लेकर उनके मां-बाप, बाइक कंपनियां औऱ सरकार सबकी सोच में एक बड़ा छेद है, और जब तक उसे भरा नहीं जाएगा, विरोधाभासों को दूर नहीं किया जाएगा, एक रोमांचक मशीन ग़लत मक़सद के लिए बदनाम होती रहेगी। लेकिन दिलचस्प सच्चाई ये है भी कि ऐसी दमदार मोटरसाइकिलें अपने सबसे एक्सट्रीम अवतार में होती हैं रेसों में। लेकिन मोटो जीपी या मोटरसाइकिल रेसिंग का पूरा पचास साल से ऊपर का इतिहास देखें तो वहां कुल 24-25 लोगों की मौत हुई होगी। जो नंबर के हिसाब से देखें तो बहुत कम है। वैसे भारत में भी नंबर तो बहुत कम हैं, वैसे भी साल में सौ सवा सौ सुपरबाइक बिक्री में क्या संख्या होगी, लेकिन ख़बरें धड़ाधड़ छपती हैं। असल दो सौ या तीन सौ की रफ़्तार पर होने वाली मौत लोगों को ज़्यादा चकित करती है, एक लीटर में सौ किमी चलने वाली मोटरसाइकिलों में लोगों को ग्लैमर नहीं नज़र आता है, और उन पर सवार लोगों का शरीर सिर्फ़ वस्त्र माना जाता है, जो फट सकता है, उनकी आत्मा तो कभी भी नष्ट नहीं हो सकती है। इसीलिए उनके अंत को इग्नोर किया जा सकता है।
*Published

September 26, 2011

New Santa Fe with Automatic Transmission

Hyundai launched the Santa Fe with automatic transmission (AT) and additional features.The four-wheel-drive Santa Fe is now available with six speed automatic transmission for smooth and stress free driving. The addition of features a spush button start and smart key ensure convenience with one-touch operation. 
Santa Fe AT
2.2.L CRDi engine
maximum power of 197PS/4000 rpm
torque of 44.5kgm/1800-2500
fuel mileage of 11.72 kmpl (ARAI certified).
Since its launch in October 2010, 
1100 units of
 Santa Fe  have been sold

The 4WD (AT) Santa Fe is priced at Rs 24,36,500 (ex-showroom Delhi), its available in five colours.

French कार- Indian रफ़्तार

ये वो कंपनी है जिसकी भारत में एंट्री भी विशुद्ध भारतीय स्टाइल में हुई है। एंट्री हुई तो कुछ साल पहले थी लेकिन क्या कांप्लिकेटेड एंट्री कही जाएगी ये। ख़ासकर गठजोड़ के मामले में। किसकी सास, किसकी ननद थी और किसका जीजा किसके बच्चे का ममेरा फूफा था ये समझ में नहीं आया। ये है फ्रेंच कंपनी रिनॉ। जिसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ है निसान के साथ ( जो भारत में अलग से मौजूद है) और जो भारत आकर मिली महिंद्रा एंड महिंद्रा से, निकाली अपनी एंट्री सेडान लोगन, जो दरअसल रिनॉ की ग्रुप कंपनी डाचिया का एक अंतर्राष्ट्रीय मॉडल थी। वही लोगन पहले बिकी, फिर थकी और आख़िरकार रिनॉ ने उसे महिंद्रा के हाथों सुपुर्द कर दिया (जिसे अब वेरीटो के नाम से जाना जाता है) और उस गठजोड़ से निकल आई। सास बहू सीरियल का एक एपिसोड पूरा। दूसरा एपिसोड था बजाज के साथ। मोटरसाइकिल-स्कूटर और ऑटो बनाने वाली बजाज के साथ इस कंपनी ने हाथ मिलाया ढाई हज़ार डॉलर कार बनाने के लिए। ये वो वक्त था जब रतन टाटा ने एक सपना देख लिया था और उस सपने ने पूरे टाटा मोटर्स की नींद उड़ा रखी थी। उसी नैनो को टक्कर देने के लिए रिनॉ और बजाज ने अपनी छोटी कार के प्रोटोटाइप को तैयार किया था। जिसे लेकर दोनों कंपनी का बाद में जो रुख़ रहा उसने कभी हां कभी ना के मुहावरे को शाहरुख़ की फ़िल्म से भी ज़्यादा सार्थक बना दिया था। फिर होते-होते बात सेपरेशन तक पहुंच गई लगती है। डाइवोर्स लॉयर रिनॉ और बजाज के बीच झूल रहे हैं। अब भारत जैसे बाज़ार में किसी कार कंपनी की ऐसी एंट्री हो तो फिर यही कहा जा सकता है कि शनि की साढ़े साती है और शुक्र की पौने आठी।
इसी ग्रह से निकलने के लिए रिनॉ ने 2012 के आख़िर तक पांच गाड़ियों के भारत में लौंच का ऐलान कर रखा है। फ़्लूएंस सेडान तो आ ही चुकी थी और अब आ गई है दूसरी गाड़ी भी। जो है दरअसल एक एसयूवी। यानि स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल, जिन गाड़ियों के ख़िलाफ़ हमारे एक्स पर्यावरण मिनिस्टर ने काफ़ी तीखा रुख़ अपनाया था। (ये बात अलग है कि उन्हें उस मंत्रालय से हटा दिया गया है) ।


तो कोलियोस है नाम रिनॉ की इस नई एसयूवी का। जिसे बहुत लंबी दूरी पर ड्राइव के लिए मैं ले गया था। काफ़ी मज़ा आया चलाने में। नो डाउट। क़ीमत थोड़ी ज़्यादा है, ख़ासकर एक नई कंपनी की एसयूवी के लिए जिसके सामने सांटा फे, फ़ॉर्चूनर जैसी गाड़ियां पहले से मौजूद हैं और इसी बजट में कई एस्टैबलिश्ड कारें भी उपलब्ध हैं। ख़ैर कार देखने में आकर्षक है, अंदर काफ़ी जगह है। कमसेकम फ़ॉर्चूनर से ज़्यादा। पिछली सीट तीन के लिए टाइट है लेकिन दो लोग आराम से बैठ सकते हैं। इंजिन भी ताक़तवर है। हां वेरिएंट एक ही दो लीटर डीज़ल, ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के साथ। और ये ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन थोड़ा और चुस्त होता तो और मज़ा आता। और 4 व्हील ड्राइव मोड में भी एआरएआई माइलेज 13.7 किमी प्रति लीटर का आया है। जो चलन में हैं वो सारे सेफ़्टी के इंतज़ाम तो किए ही गए हैं, साथ में इसे ज़्यादा कूल बनाने के लिए इसमें बोस का नामी प्रीमियम म्यूज़िक सिस्टम भी फिट किया गया है।
अगर कोलियोस को मै एक स्टैंडअलोन गाड़ी के तौर पर देखूं तो ये एक अच्छी प्रीमियम क्लास एसयूवी कही जाएगी, लेकिन इसकी क़ीमत और इसके भारत में नए ब्रांड को फ़िलहाल भारतीय ग्राहकों की कई कसौटियों पर खरा उतरना होगा। और कंपनी कहीं ना कहीं इसके लिए तैयार भी लग रही है। वैसे फ्रेंच में क्या मुहावरा है ये तो नहीं पता लेकिन हिंदी में तो सोना तप कर कुंदन ही बनता है,  और हो सकता है कंपनी को इस पर भरोसा भी हो...
* Published

September 24, 2011

X-Y-Z Factor



ये मेरी पर्सनैलिटी का एक्सटेंशन हैये जवाब था यंगिस्तान के एक नौजवान का। जब मैंने उसकी मॉडिफ़ाइड कार के बारे में पूछा था। जो लाल और काले रंग में लिपटी चमचमा रही थी। अंदर कई गैजेट्स और बाहर में चटख़ रंग-रोगन। जिसे देखकर पहचानना मुश्किल था कि ये लांसर कार है। ये कुछ साल पहले की बात हैजब एक स्टोरी के सिलसिले में इस नौजवान से मैं मिला था जो अपनी कार के ज़रिए अपना परिचय दे रहा था।
आज के वक्त में ज़रूर कहूंगा कि हम अपनी पसंद और नापसंद को लेकर इतने साकांक्ष हो गए हैंइतनी अवेयरनेस बढ़ गई हैकि उसकी बारीकियां कई बार दिमाग़ चाट जाती हैं। कौन सा रंग पसंद हैकौन सा कूज़ीन या भोजन किस मौसम में छुट्टी के लिए कहां जाना है और किस रेस्त्रां का कौन सा आइसक्रीम पसंद है...ये सब हमें मालूम है। और बताने की चाहत भी। इनमें से थोड़ा बहुत पुराने जेनरेशन को भी पता था लेकिन इसका प्रदर्शन नहीं था।
पहले की बात और थी जब विकल्प नहीं थाएंबैसेडर और प्रिमियर पद्मिनी के साथ बहुत एक्सक्लूसिव नहीं दिख सकते थे। लेकिन हम और आप साकांक्ष हैं यानि कौनश्यस हैं गाड़ी के लुक को लेकर भी। दुनिया भर की तरह अब भारत में भी आ रही है ये सोच कि हमारी पर्सनैलिटी का एक तरह से एक्स्प्रेशन है हमारी गाड़ी।
तो पहले जहां ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए न्यूट्रल किस्म के डिज़ाइन देखते थे वहीं अब कारों के लुक में ख़ास कैरेक्टर झलकने लगे हैं।

जैसे शेवरले की बीट आपको याद होगीलुक ऐसा था कि यंग लोगों को ख़ासी पसंद आई थी। और उसे डिज़ाइन भी ऐसा ही किया गया था शेवरले के कोरियन डिज़ाइनरों द्वारा। ऐसा डिज़ाइन जो कुछ को बहुत पसंद आया कुछ को बिल्कुल नहीं। ऐसा ही रहा मारुति रिट्ज़ के साथ भी। कार के पिछले हिस्से को नाम दिया गया बूमरैंग शेप। जो बीच में दबी सी नज़र आती हैइसके साथ भी वही मुद्दा । भले ही एक ख़ास लुक कार के बाज़ार को सीमित करेलेकिन उस कार को चलाते को देख ये ज़रूर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इंसान कैसा होगा।
इसी का अगला लेवल देखने को मिला ह्युंडै की नई वर्ना में। दुनिया के कई बाज़ार में ये ऐक्सेंट के नाम से बिकती है। और उसी कार के टेस्ट ड्राइव में मैं दुबई गया था तब उस कार के नाम पर फ़्लूइडिक नहीं जुड़ा था। वहां पर सिंपल ऐक्सेंट या कहें वर्ना थी।
 लेकिन भारत में लौंच के साथ ही इसे पेश किया गया फ़्लूइडिक वर्ना के तौर पर। दरअसल वर्ना को जिस कौंसेप्ट के आधार पर डिज़ाइन किया गया उसका नाम ह्युंडै ने फ़्लूइडिक डिज़ाइन रखा है। ऐसे में भारत में इसके लुक को और प्रचलित करने के लिए कंपनी ने ऐसा क़दम उठाया। जिसके साथ उस कार को एक कैरेक्टर मिला जो अब तक वर्ना में नही दिखा।
और अब लुक के मामले में एक और कार ज़िक्र करने लायक है। नई फ़ोर्ड फ़िएस्टा ।
 कार के डिज़ाइन को फ़ोर्ड ने काइनेटिक डिज़ाइन का नाम दिया है। यानि वो डिज़ाइन जो रुकी कार को भी गतिशील या रफ़्तार में दिखाए। ज़रूरी नहीं कि ये लुक सबको पसंद ही आए लेकिन ये तय है कि कार को एक पहचान मिली। पहले फ़िएस्टा बस एक कार थीबिना किसी कशिश या कहें एक्स फ़ैक्टर के साथ। अब वो इस डिज़ाइन से उसे मिला।
कुल मिलाकर लोगों के बदलते मूड को देखते हुए कंपनियां अपनी कारों को ज़्यादा से ज़्यादा आकर्षक बनाने की कोशिश में हैं। जिससे पहली नज़र में ही लोग उसे पसंद कर लें।
मेरे पसंदीदा लेखकों या कॉलमिस्ट में से एक माल्कम ग्लैडवेल का कहना है कि पहली नज़र में प्यार जैसी चीज़ शायद कुछ नहीं होती...कई मनोवैज्ञानिकों के रीसर्च की बदौलत बताते हैं कि ये दिल दा मामला नहीं होताबल्कि दिमाग़ के उस हिस्से का कमाल होता है जो किसी भी चीज़ को पहली नज़र में ही नाप लेता हैआपकी पसंद नापसंद के फाइल से मैच करता है और फिर आपको बता देता है कि वो आपको पसंद आनी चाहिए या नहींऔर ये कैल्कुलेशन इतना तेज़ होता है कि हमें भरोसा ही नहीं हो पाता कि हमारा दिमाग़ इतनी तेज़ी से कैसे सब सोच सकता हैलेखक के मुताबिक ये प्रक्रिया हमारे पलक झपकने में लेने वाले वक्त में पूरी हो जाती है। ख़ैर इस सच्चाई को अंतिम ना मानें और अपनी फ़िल्मों के सीन के रोमांस को कम ना होने दें। मैने नहीं होने दियालेकिन इस थ्योरी की अहमियत ज़रूर मानता हूं।
कहने का मतलब ये कि भले ही लुक से हम आकर्षित हों लेकिन गाड़ियों के मामले में फ़ाइनल फ़ैसले के पीछे सब कुछ कैलकुलेट होता हैमाइलेजमेंटेनेंसआफ़्टर सेल्स सर्विस...सब कुछ। यानि एक्स फ़ैक्टर के साथ वाई और ज़ेड फ़ैक्टर भी।
(*already published)