September 30, 2011

Hyundai Opens 'EON' bookings

News from Hyundai 

Hyundai Motor India Ltd (HMIL), announced the commencement of bookings of its soon to be launched new compact car – EON. The bookings will open from October 1, 2011The car will be manufactured in India at Hyundai Motor India's manufacturing facility located at Sriperumbudur near Chennai.

The EON will bear Hyundai's latest design philosophy of 'Fluidic Sculpture'.  EON has design elements and features that have been specifically developed for Indian conditions. The car has been designed at Hyundai's Namyang R&D centre located in the Gyeonggi Province in South Korea. The customers can book EON through sending SMS HYUNDAI <space> EON to 53456 or visit the Hyundai dealership or log on to www.eonindiaon.com for registrations. 


September 29, 2011

Kranti Sambhav - NDTV Social

Kranti Sambhav - NDTV Social

ROYAL ENFIELD- CLASSIC CHROME & DESERT STORM





News from Royal Enfield : 
Royal Enfield Launches Chrome and Desert Storm

RE Classic Chrome- Rs 1,50,659

RE Desert Storm-  Rs 1,43,967
(Ex- Showroom Mumbai)



Classic Chrome retains the  styling with the chrome tanks, wide mud guards and oval tool box, apart from the distinguishing tiger lamps that Royal
Enfield bikes are famed for. The single spring saddle seat, the unique tail lamp, the Royal Enfield emblems on the engine and even the font on the speedometer are all inspired by the original styling of the 1950's. artistic paintwork on the tank, 500cc, TwinSpark, unit construction engine,27.2 bhp power


Desert Storm The Desert Storm draws inspiration from the World War era, with sand colour scheme. matt finish paint job, the Royal Enfield monogram on the tank and the thigh pads.The Desert Storm is also equipped with all the technical features of the Classic Chrome like the wide mud guards, oval tool box, the signature Royal Enfield tiger lamps, single spring saddle seat and the unique tail lamp. It comes fitted with the 500cc TwinSpark, unit construction engine and the 27.2 bhp power output is made available with the Electronic Fuel Injection system.

September 28, 2011

Brio Bio-Data



Honda Brio (Ex Showroom New Delhi)
Variant 'E'- Rs 3.95 lakhs
Variant 'S'- Rs 4.35 lakhs
Variant 'S (O)'- Rs 4.90 lakhs
Variant 'V'- Rs 5.10 lakhs


Honda Siel Cars India launched its Brio (pronounced as Br-ee-o and means "energetic" and "cheerful" in Italian),
four cylinder 1.2-litre i-VTEC engine that delivers maximum output of 88 PS @ 6000 rpm and Torque of 109 Nm (11.2 kg-m) @ 4600 rpm, while giving fuel economy of 18.4 km/l, as per test data.
Brio is available in 5-speed manual transmission
3610 mm long, 1680 mm wide and 1500 mm tall with a wheelbase at 2345 mm
small turning radius of only 4.5m helps make the Brio extremely easy to drive in congested city traffic environment.

G-CON (G-Force Control Technology, the Brio's body makes extensive use of high tensile steel in key areas of the frame. Dampers, Trailing arms and Rear hatch area
dual SRS front airbags, Anti-Lock Brake System (ABS) which prevents wheel locking, Electronic Brake Distribution (EBD) which enhances braking performance, front pretensioner seat belts that pre-emptively tighten the belt to prevent the occupant from jerking forward in a crash and impact-mitigating headrests.
latest technology i-SRS airbag system with continuously staged inflation which can accommodate a broad range of occupant positions and potential collision situations.

four variants – EMT, SMT, S(O)MT and VMT
six exterior colours - Energetic Blue, Rallye Red, Urban Titanium, Alabaster Silver, Taffeta White and Crystal Black Pearl
 
The Honda Brio comes with a 2 years or 40,000 kms warranty as standard value for all customers.

Ashok Leyland's DOST

Ashok Leyland enters the Light Vehicle segment, Launches DOST, starting at Rs. 3.79 Lakhs.  
Ashok Leyland, the Hinduja Group flagship, today commercially launched in Maharashtra DOST in India's fast expanding LCV segment, first vehicle to be launched from its Joint Venture with Nissan Motor Company...priced at Rs. 3.79 lakhs to Rs. 4.37 lakhs (ex-showroom – Mumbai)

Nissan's New Sunny

सनी के बारे में सिर्फ़ जानकारी बांट रहा हूं, राय नहीं।


Petrol
Grade
XE
XL
XV
Ex- Showroom New DelhiPrice
578,000
688,000
768,000











Nissan Motor India Private Ltd launched Sedan Nissan SUNNY at 
Nissan SUNNY manufactured on the consummate V-platform will be available in the domestic market from the beginning of October, 2011. Available at 45 Nissan dealerships across the country, the Sedan can be booked from September 21, 2011 and the delivery would start from October 03, 2011. The SUNNY with a 16.95 kmpl of fuel economy (ARAI certified) will be available to customers across the country without any waiting period for delivery.


4-cylinder 1.5-liter double overhead camshaft petrol engine from Nissan
99 PS of power @ 6000 rpm
a maximum torque of 134 Nm @ 4000 rpm
five speed manual transmission, 
the SUNNY delivers a fuel efficiency of 16.95 kmpl of petrol.




SUNNY is Available in Bronze Grey, Blade Silver, Storm White, Sapphire Blue, Onyx Black and Brick Red colours, all three variants of SUNNY - base XE, mid XL and high XV – will have safety features such as Anti-Lock Breaking System (ABS), Electronic Break-force Distribution (EBD), Break Assist (BA), Engine Immobilizer and Airbags.Departing from the industry practice, Nissan has adopted a uniform pricing policy across the country to offer a fair and equitable benefit to customers all over India. Thus, the ex-showroom prices will be uniform across India except for variance in VAT, Entry Tax, Octroi and other local taxes levied by the states/cities.


The Nissan SUNNY name was first used in 1966 on a compact sedan sold in Japan and was given its cheerful name by the Japanese people from more than 8 million entries in a special naming competition. 
The Nissan SUNNY name was first used in 1966 on a compact sedan sold in Japan and was given its cheerful name by the Japanese people from more than 8 million entries in a special naming competition. 




Over the next four and a half decades, there have been nine generations of SUNNY models with total sales of more than 16 million units to 140 countries.However, the new 10th generation SUNNY Sedan is the first SUNNY to hit the Indian roads.


September 27, 2011

क्यों बदनाम होती है सिर्फ़ SUPERBIKE ???


न्यूज़ की दुनिया सालों गुज़ारने पर कई विडंबनाएं देखने को मिलती हैं, जिनमें से एक मौत भी है। कई बार ख़बरों की महत्ता तय होती है किसी दुर्घटना में मरने वालों की संख्या से या फिर सवारी से, यानि प्लेन क्रैश प्रायोरिटी, हेलिकॉप्टर क्रैश सेकेंड प्रायोरिटी फिर ट्रेन, बस वगैरह। लेकिन ये कोई थंबरूल नहीं है, परम सत्य नहीं है।
भारत में लगभग सवा लाख लोग अपनी जान सड़कों पर गंवा देते हैं। चलते हुए, साइकिल पर, बाइक पर या कारों में। लेकिन वो सिर्फ आंकड़ों में तब्दील हो जाते हैं, जहां पर किसी इंसान का चेहरा नहीं, कुछ नंबर दिखाई देते हैं। और ये नंबर भी दब जाते हैं अगर किसी प्लेन क्रैश में 6 लोगों के मरने की ख़बर आ जाए। यानि अंत के बाद भी इंसान फंसा रहता है क्लास स्ट्रगल में। यानि ये तो ज़ाहिर सी बात है कि प्लेन में उड़ने वाला कोई ना बैठा बड़ा आदमी ही होगा और लोगों को उसके बारे में जानने में ज़्यादा दिलचस्पी होगी, बजाय उस ऐटलस साइकिल पर चलने वाले अधेड़ आदमी के जो एनएच 24 पर ट्रक के नीचे आ गया है। लेकिन इस विडंबना का वास्ता सिर्फ़ क्लास डिफ़रेंस या समाजशास्त्र से है, ये अधूरी बात है। दरअसल इस दिलचस्पी की एक वजह स्वाभाविक इंसानी साइकोलजी भी है, जिसे सनसनीखेज़ रस कह सकते हैं। जब मौत की वजह से ज़्यादा बड़ा और सनसनीखेज़, मौत का तरीका हो जाता है। वो कितना क्रूर, नाटकीय रहा या वीभत्स रहा ये जानने की दबी सी उत्सुकता भी लोगों को इन ख़बरों की तरफ़ भी खींचती है। भूकंप और बाढ़ में हुई मौत एक त्रासदी होती है, सड़क हादसे किसी आम हिंदुस्तानी के मरने को उसका प्रारब्ध मान लिया जाता है लेकिन एरो शो में पायलट की मौत एक विज़ुअल घटना हो जाती है, अपने मंगेतर के साथ मिलकर एक प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी की हत्या एक ईवेंट बन जाता है। जहां मारे गए नीरज ग्रोवर के मौत के ज़िक्र से ज़्यादा बड़ी जिरह हो जाती है कि प्रेमिका ने उसके शरीर के कितने टुकड़े किए, जिस पर ज़्यादा रौशनी डालने के लिए राम गोपाल वर्मा को फ़िल्म बनानी पड़ती है (जिसका प्रोमो उसी दिन लौंच होता है जिस दिन केस का फ़ैसला आने वाला था)
कुल मिलाकर ऐसा ही कुछ होता है जब कहीं भी कोई सुपरबाइक क्रैश करती है। एक तो आम सोच में सुपरबाइक शब्द ही लार्जर देन लाइफ़ होता है, सुपर मैन की तरह सुपरबाइक। और साथ में उस रफ़्तार पर क्रैश जिसके बारे में ज़्यादातर पॉपूलेशन केवल कल्पना कर सकती है, क्योंकि ज़िदगी भर ज़मीन पर ऐसी रफ़्तार या ऐक्सिलिरेशन तो उन्होंने कभी महसूस नहीं किया होगा। और फिर शुद्ध भारतीय सवाल कि शौक के लिए कोई अपनी जान कैसे जोखिम में डाल सकता है ? हां, ब्लू लाइन के नीचे आना या मुंबई की लोकल से बाहर गिरना, या फिर बिजली से चलने वाली ट्रेन की छत से टपकना तो फिर भी मान्य है। इसीलिए जब सुपरबाइक्स गिरती हैं, सोशियोलॉजिस्ट जग जाते हैं, सेफ़्टी एक्सपर्ट आस्तीन चढ़ा लेते हैं और कंप्यूटर के कीबोर्ड घिसे जाने लगते हैं। बड़ी शिद्दत से एक ही कन्क्लूज़न निकाला जाता है कि सुपरबाइक्स बहुत ख़तरनाक हैं। और इस डिबेट में भी क्लास-चर्चा तो आ ही जाती है, क्योंकि अगर किसी दुपहिए की क़ीमत 12 से 15 लाख की हो तो फिर किसी ना किसी बड़े आदमी के बच्चे ने ही वो बाइक ख़रीदी होगी, ज़ाहिर है ऐसे चुनिंदा शौकीन पैसेवाले ही होंगे। और उस क्लास की रिपोर्टिंग तो लाज़िमी है।
ख़ैर इन ख़बरों पर कवरेज को लेकर जो भी प्रोब्लेम मुझे लगे लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूरी हालत बुरी है। सुपरबाइक्स को लेकर हिंदुस्तान में किसी तरीके की कोई जागरुकता नहीं है। और ये सरकार से लेकर आम लोगों तक में है। जिस वजह से बिना जाने-समझे पहले तो सुपरबाइक भारत में लाए गए, फिर बेचे गए और अब आलोचना का शिकार हो रहे हैं। आख़िर क्या कमी रही है अब तक इस तरह के बाइक्स के कल्चर में, जिसे लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भी कहते हैं...
सुपरबाइक्स के लिए कोई रेगुलर ट्रेनिंग की व्यवस्था भारत में नहीं है जिससे देश के सभी इलाके के राइडर सीख पाएं, सुपरबाइक चलाना। कुछ कंपनी दे रही हैं, लेकिन ये मोटरसाइकिलें क्रैश-कोर्स से नहीं सीखी जा सकती हैं...
भारत में सेफ़्टी को लेकर अब तक कोई कल्चर नहीं रहा है। दिल्ली में तो हेलमेट को लेकर एक कड़ाई देखी भी गई, देश के बाकी हिस्सों में हेलमेट तभी निकलते हैं जब कड़े ट्रैफिक कमिश्नर की पोस्टिंग होती है। और इन बड़ी बाइक्स के लिए बहुत ज़रूरी, ग्लव्स और राइडिंग गियर को तो भूल जाइए।
मां-बाप क्यों अपने बच्चों को बिना सेफ़्टी का संदेश दिए, मानो वो बच्चों के बंदूक दे रहे हैं, लेकिन ख़तरनाक बात ये कि ये खिलौना वाला नहीं असल गन है। केवल अफ़ोर्ड करना इकलौता क्राइटीरिया नहीं हो सकता है आपके गिफ़्ट के लिए। 

लेकिन इन सबके अलावा एक और मुद्दा है जो सबसे ख़तरनाक है। भारत में जो स्पोर्ट्स बाइक आईं वो सीधे 1000 सीसी वाली आईं। जिनकी आमतौर पर ताक़त 180 हॉर्सपावर के पास होती है। और ये इतनी तेज़ भागती है जिसका सही अंदाज़ा सालों के प्रैक्टिस के बाद ही हो सकता है। सरकार ने दरअसल 800 सीसी से ऊपर की मोटरसाइकिलों पर से कस्टम ड्यूटी कम किय था, अमेरिका को ख़ुश करने के लिए, जिससे हार्ली डेविडसन को भारत में आसान एंट्री मिले। होना ये चाहिए था कि 250 से 400 से 600 सीसी के इंजिन आते जिस पर बाइकर प्रैक्टिस कर पाते। लेकिन हुआ उल्टा पहले हज़ार सीसी की मोटरसाइकिलें आई हैं और बाद में 250 सीसी वाली। और अलग अलग स्टेज की बाइक्स चलाए बिना कई नौजवान सीधे बड़ी सुपरबाइक्स पर चढ़े, क्योंकि ज़्यादातक मां-बाप को भी नहीं पता था कि ये सुपरबाइक्स मज़ेदार तभी होती है, जब आपने इसे चलाना सीखा हो।
दुनिया के कई देशों में लाइसेंस इंजिन की क्षमता के हिसाब से मिलते हैं। यानि हौंडा ऐक्टिवा के लिए अलग लाइसेंस और हौंडा सीबीआर 1000 के लिए अलग लाइसेंस। लेकिन भारत में सरकार ने उन बाइक्स को आने की इजाज़त दे दी है, लेकिन लाइसेंस के सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया है।
कुल मिलाकर आम राइडर से लेकर उनके मां-बाप, बाइक कंपनियां औऱ सरकार सबकी सोच में एक बड़ा छेद है, और जब तक उसे भरा नहीं जाएगा, विरोधाभासों को दूर नहीं किया जाएगा, एक रोमांचक मशीन ग़लत मक़सद के लिए बदनाम होती रहेगी। लेकिन दिलचस्प सच्चाई ये है भी कि ऐसी दमदार मोटरसाइकिलें अपने सबसे एक्सट्रीम अवतार में होती हैं रेसों में। लेकिन मोटो जीपी या मोटरसाइकिल रेसिंग का पूरा पचास साल से ऊपर का इतिहास देखें तो वहां कुल 24-25 लोगों की मौत हुई होगी। जो नंबर के हिसाब से देखें तो बहुत कम है। वैसे भारत में भी नंबर तो बहुत कम हैं, वैसे भी साल में सौ सवा सौ सुपरबाइक बिक्री में क्या संख्या होगी, लेकिन ख़बरें धड़ाधड़ छपती हैं। असल दो सौ या तीन सौ की रफ़्तार पर होने वाली मौत लोगों को ज़्यादा चकित करती है, एक लीटर में सौ किमी चलने वाली मोटरसाइकिलों में लोगों को ग्लैमर नहीं नज़र आता है, और उन पर सवार लोगों का शरीर सिर्फ़ वस्त्र माना जाता है, जो फट सकता है, उनकी आत्मा तो कभी भी नष्ट नहीं हो सकती है। इसीलिए उनके अंत को इग्नोर किया जा सकता है।
*Published

September 26, 2011

New Santa Fe with Automatic Transmission

Hyundai launched the Santa Fe with automatic transmission (AT) and additional features.The four-wheel-drive Santa Fe is now available with six speed automatic transmission for smooth and stress free driving. The addition of features a spush button start and smart key ensure convenience with one-touch operation. 
Santa Fe AT
2.2.L CRDi engine
maximum power of 197PS/4000 rpm
torque of 44.5kgm/1800-2500
fuel mileage of 11.72 kmpl (ARAI certified).
Since its launch in October 2010, 
1100 units of
 Santa Fe  have been sold

The 4WD (AT) Santa Fe is priced at Rs 24,36,500 (ex-showroom Delhi), its available in five colours.

French कार- Indian रफ़्तार

ये वो कंपनी है जिसकी भारत में एंट्री भी विशुद्ध भारतीय स्टाइल में हुई है। एंट्री हुई तो कुछ साल पहले थी लेकिन क्या कांप्लिकेटेड एंट्री कही जाएगी ये। ख़ासकर गठजोड़ के मामले में। किसकी सास, किसकी ननद थी और किसका जीजा किसके बच्चे का ममेरा फूफा था ये समझ में नहीं आया। ये है फ्रेंच कंपनी रिनॉ। जिसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ है निसान के साथ ( जो भारत में अलग से मौजूद है) और जो भारत आकर मिली महिंद्रा एंड महिंद्रा से, निकाली अपनी एंट्री सेडान लोगन, जो दरअसल रिनॉ की ग्रुप कंपनी डाचिया का एक अंतर्राष्ट्रीय मॉडल थी। वही लोगन पहले बिकी, फिर थकी और आख़िरकार रिनॉ ने उसे महिंद्रा के हाथों सुपुर्द कर दिया (जिसे अब वेरीटो के नाम से जाना जाता है) और उस गठजोड़ से निकल आई। सास बहू सीरियल का एक एपिसोड पूरा। दूसरा एपिसोड था बजाज के साथ। मोटरसाइकिल-स्कूटर और ऑटो बनाने वाली बजाज के साथ इस कंपनी ने हाथ मिलाया ढाई हज़ार डॉलर कार बनाने के लिए। ये वो वक्त था जब रतन टाटा ने एक सपना देख लिया था और उस सपने ने पूरे टाटा मोटर्स की नींद उड़ा रखी थी। उसी नैनो को टक्कर देने के लिए रिनॉ और बजाज ने अपनी छोटी कार के प्रोटोटाइप को तैयार किया था। जिसे लेकर दोनों कंपनी का बाद में जो रुख़ रहा उसने कभी हां कभी ना के मुहावरे को शाहरुख़ की फ़िल्म से भी ज़्यादा सार्थक बना दिया था। फिर होते-होते बात सेपरेशन तक पहुंच गई लगती है। डाइवोर्स लॉयर रिनॉ और बजाज के बीच झूल रहे हैं। अब भारत जैसे बाज़ार में किसी कार कंपनी की ऐसी एंट्री हो तो फिर यही कहा जा सकता है कि शनि की साढ़े साती है और शुक्र की पौने आठी।
इसी ग्रह से निकलने के लिए रिनॉ ने 2012 के आख़िर तक पांच गाड़ियों के भारत में लौंच का ऐलान कर रखा है। फ़्लूएंस सेडान तो आ ही चुकी थी और अब आ गई है दूसरी गाड़ी भी। जो है दरअसल एक एसयूवी। यानि स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल, जिन गाड़ियों के ख़िलाफ़ हमारे एक्स पर्यावरण मिनिस्टर ने काफ़ी तीखा रुख़ अपनाया था। (ये बात अलग है कि उन्हें उस मंत्रालय से हटा दिया गया है) ।


तो कोलियोस है नाम रिनॉ की इस नई एसयूवी का। जिसे बहुत लंबी दूरी पर ड्राइव के लिए मैं ले गया था। काफ़ी मज़ा आया चलाने में। नो डाउट। क़ीमत थोड़ी ज़्यादा है, ख़ासकर एक नई कंपनी की एसयूवी के लिए जिसके सामने सांटा फे, फ़ॉर्चूनर जैसी गाड़ियां पहले से मौजूद हैं और इसी बजट में कई एस्टैबलिश्ड कारें भी उपलब्ध हैं। ख़ैर कार देखने में आकर्षक है, अंदर काफ़ी जगह है। कमसेकम फ़ॉर्चूनर से ज़्यादा। पिछली सीट तीन के लिए टाइट है लेकिन दो लोग आराम से बैठ सकते हैं। इंजिन भी ताक़तवर है। हां वेरिएंट एक ही दो लीटर डीज़ल, ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के साथ। और ये ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन थोड़ा और चुस्त होता तो और मज़ा आता। और 4 व्हील ड्राइव मोड में भी एआरएआई माइलेज 13.7 किमी प्रति लीटर का आया है। जो चलन में हैं वो सारे सेफ़्टी के इंतज़ाम तो किए ही गए हैं, साथ में इसे ज़्यादा कूल बनाने के लिए इसमें बोस का नामी प्रीमियम म्यूज़िक सिस्टम भी फिट किया गया है।
अगर कोलियोस को मै एक स्टैंडअलोन गाड़ी के तौर पर देखूं तो ये एक अच्छी प्रीमियम क्लास एसयूवी कही जाएगी, लेकिन इसकी क़ीमत और इसके भारत में नए ब्रांड को फ़िलहाल भारतीय ग्राहकों की कई कसौटियों पर खरा उतरना होगा। और कंपनी कहीं ना कहीं इसके लिए तैयार भी लग रही है। वैसे फ्रेंच में क्या मुहावरा है ये तो नहीं पता लेकिन हिंदी में तो सोना तप कर कुंदन ही बनता है,  और हो सकता है कंपनी को इस पर भरोसा भी हो...
* Published

September 24, 2011

X-Y-Z Factor



ये मेरी पर्सनैलिटी का एक्सटेंशन हैये जवाब था यंगिस्तान के एक नौजवान का। जब मैंने उसकी मॉडिफ़ाइड कार के बारे में पूछा था। जो लाल और काले रंग में लिपटी चमचमा रही थी। अंदर कई गैजेट्स और बाहर में चटख़ रंग-रोगन। जिसे देखकर पहचानना मुश्किल था कि ये लांसर कार है। ये कुछ साल पहले की बात हैजब एक स्टोरी के सिलसिले में इस नौजवान से मैं मिला था जो अपनी कार के ज़रिए अपना परिचय दे रहा था।
आज के वक्त में ज़रूर कहूंगा कि हम अपनी पसंद और नापसंद को लेकर इतने साकांक्ष हो गए हैंइतनी अवेयरनेस बढ़ गई हैकि उसकी बारीकियां कई बार दिमाग़ चाट जाती हैं। कौन सा रंग पसंद हैकौन सा कूज़ीन या भोजन किस मौसम में छुट्टी के लिए कहां जाना है और किस रेस्त्रां का कौन सा आइसक्रीम पसंद है...ये सब हमें मालूम है। और बताने की चाहत भी। इनमें से थोड़ा बहुत पुराने जेनरेशन को भी पता था लेकिन इसका प्रदर्शन नहीं था।
पहले की बात और थी जब विकल्प नहीं थाएंबैसेडर और प्रिमियर पद्मिनी के साथ बहुत एक्सक्लूसिव नहीं दिख सकते थे। लेकिन हम और आप साकांक्ष हैं यानि कौनश्यस हैं गाड़ी के लुक को लेकर भी। दुनिया भर की तरह अब भारत में भी आ रही है ये सोच कि हमारी पर्सनैलिटी का एक तरह से एक्स्प्रेशन है हमारी गाड़ी।
तो पहले जहां ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए न्यूट्रल किस्म के डिज़ाइन देखते थे वहीं अब कारों के लुक में ख़ास कैरेक्टर झलकने लगे हैं।

जैसे शेवरले की बीट आपको याद होगीलुक ऐसा था कि यंग लोगों को ख़ासी पसंद आई थी। और उसे डिज़ाइन भी ऐसा ही किया गया था शेवरले के कोरियन डिज़ाइनरों द्वारा। ऐसा डिज़ाइन जो कुछ को बहुत पसंद आया कुछ को बिल्कुल नहीं। ऐसा ही रहा मारुति रिट्ज़ के साथ भी। कार के पिछले हिस्से को नाम दिया गया बूमरैंग शेप। जो बीच में दबी सी नज़र आती हैइसके साथ भी वही मुद्दा । भले ही एक ख़ास लुक कार के बाज़ार को सीमित करेलेकिन उस कार को चलाते को देख ये ज़रूर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इंसान कैसा होगा।
इसी का अगला लेवल देखने को मिला ह्युंडै की नई वर्ना में। दुनिया के कई बाज़ार में ये ऐक्सेंट के नाम से बिकती है। और उसी कार के टेस्ट ड्राइव में मैं दुबई गया था तब उस कार के नाम पर फ़्लूइडिक नहीं जुड़ा था। वहां पर सिंपल ऐक्सेंट या कहें वर्ना थी।
 लेकिन भारत में लौंच के साथ ही इसे पेश किया गया फ़्लूइडिक वर्ना के तौर पर। दरअसल वर्ना को जिस कौंसेप्ट के आधार पर डिज़ाइन किया गया उसका नाम ह्युंडै ने फ़्लूइडिक डिज़ाइन रखा है। ऐसे में भारत में इसके लुक को और प्रचलित करने के लिए कंपनी ने ऐसा क़दम उठाया। जिसके साथ उस कार को एक कैरेक्टर मिला जो अब तक वर्ना में नही दिखा।
और अब लुक के मामले में एक और कार ज़िक्र करने लायक है। नई फ़ोर्ड फ़िएस्टा ।
 कार के डिज़ाइन को फ़ोर्ड ने काइनेटिक डिज़ाइन का नाम दिया है। यानि वो डिज़ाइन जो रुकी कार को भी गतिशील या रफ़्तार में दिखाए। ज़रूरी नहीं कि ये लुक सबको पसंद ही आए लेकिन ये तय है कि कार को एक पहचान मिली। पहले फ़िएस्टा बस एक कार थीबिना किसी कशिश या कहें एक्स फ़ैक्टर के साथ। अब वो इस डिज़ाइन से उसे मिला।
कुल मिलाकर लोगों के बदलते मूड को देखते हुए कंपनियां अपनी कारों को ज़्यादा से ज़्यादा आकर्षक बनाने की कोशिश में हैं। जिससे पहली नज़र में ही लोग उसे पसंद कर लें।
मेरे पसंदीदा लेखकों या कॉलमिस्ट में से एक माल्कम ग्लैडवेल का कहना है कि पहली नज़र में प्यार जैसी चीज़ शायद कुछ नहीं होती...कई मनोवैज्ञानिकों के रीसर्च की बदौलत बताते हैं कि ये दिल दा मामला नहीं होताबल्कि दिमाग़ के उस हिस्से का कमाल होता है जो किसी भी चीज़ को पहली नज़र में ही नाप लेता हैआपकी पसंद नापसंद के फाइल से मैच करता है और फिर आपको बता देता है कि वो आपको पसंद आनी चाहिए या नहींऔर ये कैल्कुलेशन इतना तेज़ होता है कि हमें भरोसा ही नहीं हो पाता कि हमारा दिमाग़ इतनी तेज़ी से कैसे सब सोच सकता हैलेखक के मुताबिक ये प्रक्रिया हमारे पलक झपकने में लेने वाले वक्त में पूरी हो जाती है। ख़ैर इस सच्चाई को अंतिम ना मानें और अपनी फ़िल्मों के सीन के रोमांस को कम ना होने दें। मैने नहीं होने दियालेकिन इस थ्योरी की अहमियत ज़रूर मानता हूं।
कहने का मतलब ये कि भले ही लुक से हम आकर्षित हों लेकिन गाड़ियों के मामले में फ़ाइनल फ़ैसले के पीछे सब कुछ कैलकुलेट होता हैमाइलेजमेंटेनेंसआफ़्टर सेल्स सर्विस...सब कुछ। यानि एक्स फ़ैक्टर के साथ वाई और ज़ेड फ़ैक्टर भी।
(*already published)

September 22, 2011

Traffic मसाला डोसा


...रोज़ फेसबुक पर मैं लिख रहा हूं, वो लाइनें जिसे कई बकवास मानते हैं, मैं कहता हूं ट्रैफ़िक मसाला डोसा। जिसकी एंट्री वहां होती है, जिस डब्बे को दिखाकर ज़ूकरबर्ग कहता है कि आपके सर पर क्या सवार है, ये दोस्तों को बताइए। और चूंकि अभी भी चिट्ठी के आख़िर में मैं योर्स ओबिडिएंटली क्रांति संभव ही लिखता हूं तो मैं इस बक्से में भी कुछ लिखने लगा हूं...जिसे कहते हैं स्टेटस मेसेज और जो मेरे जज़्बातों के लिए मसाज का काम भी करता है। वो जज़्बात जो उभर कर आते हैं कई बार सड़कों के बीच में...जब बाईं ओर से स्कॉर्पियो वाला मुझे ओवरटेक करता है, मोबाइल पर बात करने की वजह से जो नहीं दे पाता है इंडीकेटर और उसे लगता है कि टेलिपैथी के ज़रिए मैं समझ जाउंगा कि वो अब ओवरटेक करके अचानक दाएं होने वाला है और फिर स्लो हो जाने वाला है, मानो उसने संकट मोचन मंदिर में यही मन्नत मांगी थी कि देश के किसी मूर्धन्य या फिर धन्य  कुचले पत्रकार को उसकी औक़ात समझा सकूं...वैसे इमानदारी से कहूं तो हाल में मेरी गाड़ी में जितना ख़र्चा लगा है, उसे चुकाने के बाद मैं पहले से कहीं ज़्यादा संवेदनशील हो गया हूं, मैं -कोई मिल गया- का रितिक रौशन हो चुका हूं, कि मुझे पता चल जाता है कि तीन किलोमीटर आगे कैसे कोई सैंट्रो वाला मेरे लिए घात लगाए बैठा है, जो अचानक शाहरुख़ ख़ान की तरह अपनी स्टीयरिंग घुमाएगा और मेरे कलेजे के एक सत्रहवें हिस्से को मेरे मुंह के रास्ते निकलने की वजह देगा। लेकिन कई बार ये सिक्स्थ सेंस बिज़ी होता है।
सैंट्रो के सिग्नल को बीच में इंटरसेप्ट करके एक सफ़ेद कॉलसेंटर सिंड्रोम से पीड़ित टवेरा मुझे पहले दाएं से ओवरटेक करती है, फिर बाएं से, आगे जाकर अचानक ब्रेक मारती है, फिर अचानक पीछे से आकर हॉर्न बजाती है...लग रहा है कि मैं ज्वेल थीफ़ का देव आनंद हूं, गरदन टेढ़ी करके ढोल बजा रहा हूं और वो टवेरा वैजंति माला है और इर्द गिर्द नाचते हुए कह रही है कि होठों पे ऐसी बात मैं छुपा के चली आई.... वैसे बुनियादी सवाल ये है कि वाई शुड आई केयर कि कॉल सेटंर टवेरा क्या बात छुपा सकती है...हाऊ मे आई हेल्प यू मिस्टर बॉब फ्रॉम बाल्टीमोरडैम इट...तो इसी पूर्वाग्रह के साथ मैं विश्वामित्र की तरह स्थिर चित्त एक रफ़्तार में चला जा रहा हूं, ये बात अलग है कि पिछली बारिश में ये गाड़ी भीग गई थी, मंदाकिनी से थोड़ा कम और श्रीदेवी से थोड़ा ज़्यादा, जिसके बाद से मेरी गाड़ी की टॉप स्पीड मेरी मजबूरी है विकल्प नहीं।  वैसे ये काबिलेतारीफ़ बात कही जानी चाहिए और रोटरी क्लब के द्वारा मुझे प्रशस्ति पत्र मिलना चाहिए कि पूरा देश जब इनकसेंस्टेंसी से जूझ रहा है, वहां पर मेरी कंसेस्टेंसी आने वाली नस्लों के लिए एक समाजशास्त्रीय स्टडी हो सकती है। लेकिन फिर ये सोच कर अपनी मांग वापस लेता हूं कि उस सर्टिफिकेट से मुझे एक लीटर पेट्रोल भी नहीं मिलेगा...तो वापस आता हूं उसी स्कॉर्पियो पर, सॉरी टवेरा या सैंट्रो ...आई डोंट नो मेट...लगता है भूल गया...
वैसे कई सारी हैं, सड़कों पर दिमाग़ ज़्यादा चलता है इसलिए कई तरीके के कैल्कुलेशन करता रहता हूं...कई बार नुसरत और कोल्डप्ले सुनते हुए कई बार मैडम अख़्तर को सुनते हुए और कई बार चुप्पी में भी। ख़ैर। फिर से वापस आता हूं। पिछले शुक्ल पक्ष या विपक्ष की बात है....लाजपत नगर की सड़क पर ट्रैफ़िक में दबा सा, मिडिल क्लास के डेली स्ट्रगल को गरिमामंडित करते हुए अपनी धीमी रफ़्तार गाड़ी से सड़क के बीचो बीचे चला जा रहा था....सबसे दाईं वाली लेन में गाड़ियों की क़तार लगती दिखाई दे रही थी...वो जगह ऐसी है जहां पर एक ही सड़क के दो हिस्से एक दूसरे से रूठते हुए मुड़ जाते हैं, एक तो बाईं तरफ़ सेंट्रल मार्केट में चली जाती है, जिस मोड़ के एक तरफ़ एक ज़माने में स्टूडेंट बस पास बनाने वाला सीमेंट का चहलपहल भरा कमरा दीखता था, और उसके दूसरे ओर इतने जूस कॉर्नर हुआ करते थे कि ज्योमेट्री के सारे थ्योरम से इंसानियत का भरोसा उठ जाए, दाएं बाएं तो ठीक, बीच और ऊपर वाले दुकान भी ख़ुद को जूस कॉर्नर ही बताते, जूस सेंटर या सेंटर फ़ॉर्वर्ड नहीं...रूठी हुई सड़क का दूसरा सिरा बहुत ही महत्वाकांक्षी तरीके से एक फ्लाईओवर में तब्दील हो जाता है। वैसे उसकी अकड़ भी जल्द ख़त्म हो जाती है जब 8 लेन का ट्रैफ़िक तीन लेन में अंटने की कोशिश में, इसका करियर नेहरू नगर में जाकर भद्दे तरीके से ख़त्म कर देता है।  लेकिन आज कहानी वहां तक नहीं जा रही है। प्लॉट तो पहले से तैयार हो गया था। एक श्कोडा वाले सज्जन ने ट्रैफ़िक के मोमेंटम के ऊपर अपने हार्मोनल ज़रूरत को तरजीह दी, अधेड़ उम्र में अपने जीवन के माएने खोजने की प्रक्रिया में नज़र एक बाला पर टिकी, और जैसा कि कोई भी 42 साल का शरीफ़ शादीशुदा इंसान करेगा, प्रकृति की उस सुंदर क्रिएटिविटी को इज़्ज़त देगा, ख़ुद को नहीं रोकेगा तो ऐसा ही उन्होंने भी किया। ख़ुद को बिल्कुल नहीं रोका, गाड़ी रोकी। और ज़ाहिर है कि ऐसी अलौकिक प्रक्रिया में कोई भी जानबूझ कर अड़चन नहीं डालेगा, जिसके भी दिल में जज़्बात हैं और कार की स्टीरियो में अन्नू मलिक के गाने हैं वो अप्रिशिएट तो करेगा ही इस जज़बात को, और बल्कि उसी बाला को निहार कर अपना सपोर्ट भी प्रदर्शित करेगा। लेकिन सच्चाई के अनगिनत पहलुओं में से एक पहलू है कलयुग भी और इसी युग के बर्थ सर्टिफिकेट के नशे में चूर एक नौजवान नहीं कद्र कर पाया इस रेयर खगोलीय घटना को और रगेत के मारा अपनी कार, लाल श्कोडा के पीछ लगी 8 गाडियों की कतार में सबसे आख़िर में खड़ी गाड़ी में। रगेत वाला वर्ड हमेशा मुझे फैसिनेट करता है, इट्स फ्रॉम पटना यू नो। अगर दिल्ली वाली हिंदी में बोलूं तो सूत के मारा। वहीं इसका एक बॉलीवुड पैरलल खींचू तो बिल्कुल उसी तरह मारा जैसे आई थिंक इंस्पेक्टर सन्नी या किसी बन्नी ने एक चमड़े के बैट से विलेन के पृष्ठ भाग में ऑटोग्राफ़ दिया था। तो आगे बढ़ते हैं। तो उस सफ़ेद सफ़ारी ने अगली गाड़ी को ठोका, जो न्यूट्रल में थी, उसने उसी चोट को आगे पास किया, फिर आगे और आगे एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। अचानक 8-9 गाड़ियां जो कुछ सेकेंड पहले तक प्रकृति के साथ एकाकार होते लैंडस्केप का हिस्सा थीं, एक अनचाहे चुंबन का शिकार बनी। जिसमें रत्ती भर भी ब्यूटी नहीं थी, पैशन नहीं था, क्योंकि इसमें होठों की जगह सफ़ारीनुमा हथौड़े का इस्तेमाल था, जो दिल दहलाने वाला और शरीर से लेकर आत्मा तक को चोट पहुंचाने वाला था। और मैं इस घटना का गवाह था। लग रहा था मेरी आंखें एक ऐसे कैमरे की तरह हैं, जो बल्ले से निकले बॉल के साथ चल रहा है, ज़ूम इन या ज़ूम आउट नहीं..साथ में चल रहा है। एक हाई डेफिनिशन वीडियो जिसकी एक एक डीटेल मेरे सामने खुल रही है। ये सब मैंने बताया तो बहुत रायता फैला कर है लेकिन कुल मिलाकर 2-3 सेकेंड में ये लंका-कांड समाप्त हो चुका था।
जैसा कि कहा जाता है कि शरीर तो सिर्फ़ वस्त्र है, और जिस फटे वस्त्र के लिए इंश्योरेंस भी क्लेम कर सकते हैं उसके लिए क्या रोना, क्या फ़ील करना। वैसे भी अपने ईएमआई, पेट्रोल और बिजली बिल का रोना कम है कि उन टिन के वस्त्रों के लिए सोचूं। लेकिन थोड़ा सोचा। फिर ये भी सोचा कि क्या सोचा ये बताने की मजबूरी तो नहीं है, वैसे भी ब्लॉग पर मैं लिख रहा हूं...डज़न्ट मैटर की ये पढ़ कर किसी के जीवन में कुछ ऐड हो या ना हो, मैं तो कमसेकम इसे अपने दिमाग़ के डेटाबेस से सबट्रैक्ट कर लूं। लेकिन फिर भी मैं आम भारतीय की तरह नॉन जवाबदेहिक सलाह तो दे ही दूं...सड़क के सबसे दाईं ओर कम ही चलाएं...वैसे इंटरनैशनली उसका इस्तेमाल ओवरटेकिंग के लिए होता है लेकिन मैं ग़ुलाम मानसिकता वाला भारतीय नहीं हूं इसलिए इंटरनैशनली इसका इस्तेमाल किसी के लिए भी हो, आई डू नॉट केयर। सड़क की बाईं ओर चलाने से व्यू बेहतर होता है दरअसल, बस स्टॉप होता है, ऑटो स्टैंड होता है, और संजय लीला भंसाली से नई हीरोईन खोजने का एकतरफ़ा वायदा आपने कर रखा है वो बेहतर तरीके से निभा पाएंगे। और अगर गाड़ी रोकनी भी पड़े तो अनचाहे चुंबन की आशंका कम ही हो। तो इसी अनमोल एडवाइस के साथ.... शब्बा ख़ैर। 

September 18, 2011

Total Recall .....


रीकॉल का कैसा मतलब निकाला जाता है मीडिया में ....ये सवाल अभी हाल में आया..इस सवाल की टाइमिंग सही रहीहाल फिलहाल के रीकॉल के ऐलानों को देखते हुएउन ऐलानों पर बनने वाली ख़बरों के देखते हुए...और ऊपर से ये सवाल आया किसी कार निर्माता की तरफ़ से...तब जवाब देते वक्त लगा कि कार रीकॉल के सवाल पर अभी भी हमारी राय काफ़ी बंटी हुई हैचाहे वो मी़डिया होआम ग्राहक हो या फिर कार निर्माता ही क्यों ना हों....ग्लोबल स्तर पर रीकॉल के मामले में इतनी मारामारी देखी हमने टोयोटा को लेकरजिस कंपनी को लाखों गाडि़यों का रीकॉल करना पड़ाचाहे एक्सिलिरेटर की शिकायत आई हो या ख़राब कार्पेट की। वहीं कुछ महीने पहले जब सालों से मिडसाइज़ सेडान सेगमेंट में राज करने वाली हौंडा सिटी का एकाधिकार ख़त्म हुआ था,नंबर एक का ताज छिना तो तुरंत उसका रिश्ता हाल में ऐलान हुए हौंडा सिटी कारों के रीकॉल से जोड़ दिया गया। और यहां पर सवाल ये उठता है कि रीकॉल के बारे में हमारी समझ कैसी है और उस समझ का असर क्या होता है।
आमतौर पर अमेरिकी बाज़ार में बहुत ठोस सुरक्षा और ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। जहां अगर कारों में कोई छोटी गड़बड़ी भी हो तो फिर हज़ारों कारों का रीकॉल होना कोई अनोखी बात नहीं ...शायद ही कोई कंपनी ऐसी है जिसकी गाड़ियां वापस नहीं बुलाई गई हो। जहां इसे कार कंपनियों का ज़िम्मेदार रवैया माना जाता है वही लग्ज़री गाड़ियों के रीकॉल जैसे बीएमडब्ल्यू के हाल के रीकॉल पर सवाल भी उठाए ज़रूर जाते हैं।
वैसे यहां पर मैं वो मोटे कनफ़्यूज़न को दूर कर दूं जो कई लोगों के मुंह से सुना था, कि कार को वापस बुलाना मतलब गाड़ी वापस लेना नहीं है...कार कंपनियां कार को वापस वर्कशॉप में बुलाकर खराब पार्ट-पुर्ज़ा बदलती हैंपूरी कार नहीं।
भारतीय कार कंपनियों में फ़िलहाल रीकॉल का डर साफ़ देखा जा सकता है। पहले भी कई कारों के कुछ पार्ट कंपनियों ने ख़ुद बुलाकर बदले थे। लेकिन रीकॉल का नाम नहीं दिया था। लेकिन हाल में हौंडा और मारुति ने थोड़ी हिम्मत तो दिखाई है। हौंडा को अपनी सिटी के इंजिन के एक स्प्रिंग को बदलने के लिए वापस बुलाना पड़ा और मारुति को अपनी कारों के इंजिन के एक बोल्ट को बदलने के लिए गाड़ियां बुलानी पड़ी तो कंपनी बाकायदा ऐलान किया। वहीं टाटा मोटर्स ने नैनो में बदलाव के लिए आफ़र तो दियाकि एक्स्ट्रा सुरक्षा के लिए नई फिटिंग ग्राहक मुफ़्त करवा सकते है लेकिन तुरंत ही ये भी प्रेस नोट जारी कर दिया कि वो रीकॉल नहीं।
कार रीकॉल पर बहस इन्हीं दो सिरों पर झूलती रहेगी। इसके एक सिरे पर तो ग्राहकों के साथ धोखा होगा । चूंकि कार कंपनी सार्वजनिक तौर पर किसी ख़ामी को स्वीकार नहीं करतीं तो उनकी ज़िम्मेदारी नहीं बनती और ऐसे में कई बार ग्राहकों को अपने ख़र्चे पर ख़राब हिस्सा बदलवाते और वर्कशॉप का चक्कर लगाते देखा है हमने।
दूसरी तरफ़ जहां ये समझना ज़रूरी है कि कारों का प्रोडक्शन कोई एक दो पुर्ज़े के बनने से नहीं होताहज़ार हिस्से जुड़कर कार बनती है। जिनमें से कई हिस्से बाहरी कंपनियां भी बनाती हैं। ऐसे में किसी पार्ट बनाने वाली कंपनी की ग़लती से किसी ख़ास लॉट में गड़बड़ी होना नामुमकिन नहीं। तो फिर ऐसे में ज़रूरत है उस जागरूकता कि जिससे कार निर्माता अपने ख़राब प्रोडक्शन के लिए जवाबदेह होंज़िम्मेदार हों। लेकिन साथ में कंपनियों को वो भरोसा भी मिलना चाहिए मीडिया और ग्राहकों से कि वो खुलकर अपनी ग़लती माने। आने वाले वक्त में उम्मीद है कि कंपनियां ज़्यादा पारदर्शिता से अपनी ग़लतियों को सुधारने की कोशिश करेंगी और ग्राहकों के हक़ नहीं मारे जाएंगे।
**Published Already

September 17, 2011

थोड़ा स‌ा रूमानी हो जाएं…

वजहें राग दरबारी के ट्रक की तरह स‌े होती हैं। जितने अलग एंगिल स‌े देखिए तो उसका मतलब बदलता जाता है। किस वजह स‌े हम किसी चीज़ का इस्तेमाल करते हैं, उससे उस चीज़ का मतलब बदल जाता है। उसका वाशिंग मशीन पंजाब में लस्सी बनाने की मशीन बन जाती है और पंपिंग स‌ेट ट्रैक्टर में। जिस गांव में तीन महीने में एक बार पौने घंटे के लिए बिजली आती है वहां पर आटा चक्की मशीन में लगा जेनरेटर पूरे गांव के मोबाईल फ़ोन का चार्जिंग प्वाइंट बन जाता और क्योंकि दस रु के लाइटर में एलईडी लाइट लगा होता है इसीलिए मेरे गांव में भी हज़ारों चाइनीज़ लाइटर आ जाते हैं जहां पर शायद ही किसी को स‌िगरेट-बीड़ी पीते आप देखेंगे। 


कहने का मतलब आप स‌मझ ही गए होंगे। हम किस कार या मोटरसाइकिल को किस वजह स‌े ख़रीदते हैं या पस‌ंद करते हैं, उस स‌वारी का मतलब बदल देता है। दिल्ली की स‌ड़कों पर हज़ारों एसयूवी दौड़ती रहती हैं, जिनमें बैठे स‌ज्जन काले चश्मे के पीछे स‌े ये भाव देते हैं कि देखिए एक ‘माचो’ आपके बगल से गुज़र रहा है …लेकिन उन स‌भी एसयूवी में स‌े 90 फ़ीसदी के पहियों पर स‌ाल के एक बार भी मिट्टी नहीं लगती है, कौंक्रीट में ही मंडराती हैं वो गाड़ियां। और ये इमेज शायद ही कोई तोड़ पाता है, इसीलिए जब कोई एसयूवी वाला ऐसा मिला जो वाकई अपनी एसयूवी का इस्तेमाल कर रहा था तो अटपटा लग जाता है। काफ़ी वक्त पहले जब मैं मिला दिल्ली के एक गूजर नेता स‌े, तो उनकी कई मंहगी गाड़ियो-कारों की लाइन में कई एसयूवी खड़ी थीं, मंहगी-मंहगी। और अगर बिहारी आरिजिन का कोई इंसान अगर पालिटिशयन की एसयूवी की खेप देखेगा उसका एसोसिएशन सीधा सा होगा-नेता-दबंग-एसयूवी। इमेज के लिए ज़रूरी गाड़ी। लेकिन फिर भी जेनरली मैंने पूछ लिया...एसयूवी क्यों ज़्यादा तो जवाब मिला कि भई खेत भी तो हैं हमारे, हर थोड़े ही ना हमेशा दिल्ली में रहते हैं। 
एक जोड़े स‌े मिला था, उनकी गाड़ी बड़ी दिलचस‌्प लगी। पुरानी लैंड रोवर मिट्टी स‌े स‌नी हुई। कोई एक्स्ट्रा ताम झाम नहीं। पति-पत्नी जंगल में ही रहते हैं, एक छोटा स‌ा रिज़ॉर्ट चलाते हैं।और लगता है कि उनके ज़िंदगी का हिस्सा है वो स‌वारी। वो लैंड रोवर उस जोड़े के दिनचर्या की डायरी लगती है, स‌ुबह का नाश्ता कहां हो रहा है और दोपहर के खाने स‌े पहले कहां कहां टहल कर आए हैं, जंगल के किस कोने स‌े किस अनोखे पंछी को देखकर वापस आए हैं। 
ऎसी ही छाप दिखती है कई बाइकर मित्रों की मोटरसाइकिलों में। उनके पहचान छलक कर उनकी स‌वारी पर आ जाती है, किनारे में लगे कैरियर बताते हैं कि दोनों किस लंबे स‌फ़र पर एक स‌ाथ निकले थे। कहां पर वो लड़खड़ाए थे और कहां किस चढ़ाई पर उनका दम फूल गया था। 


लेकिन बड़ा दुख होता है उन गाड़ियों को देखकर जो बेलल्ला स‌ी लगती हैं, थोड़ी खोई स‌ी – अनचाही स‌ी। उन पर कोई निशानी नहीं होती ये बताने के लिए कि वो किसी की ज़िंदगी में शामिल हैं। वो बस प्वाइंट ए स‌े प्वाइंट बी के लिए इस्तेमाल होती हैं। और फिर रुक जाती हैं। कई बार बहुत मंहगी और कई बार स‌स्ती ।
आज की तारीख़ में इमेज बहुत अहम हो चुका है, हम कहां पर, कैसे दिख रहे हैं, पेश हो रहे हैं। आपके हाथ में कौन स‌ा फ़ोन है, आपके शर्ट के आस्तीन पर किसी बड़े ब्रांड कि निशानी है कि नहीं...और आप उतर किस गाड़ी स‌े रहे हैं। ऎसे में बड़ा दुख होता है ऎसी गाड़ियों को देखकर जो स‌िर्फ़ शॉर्टकट या डेस्कटॉप के आइकन की तरह इस्तेमाल में आती हैं। स‌ोशल स‌्टेटमेंट देने के लिए । उम्मीद है आपके घर के बाहर जो स‌वारी है, स‌्प्लेंडर स‌े लेकर मर्सेडीज़ तक, उन पर आपकी छाप है, और लग रहा है कि नहीं है अभी तो फिर हो जाए। लेकर निकल जाइए उसे आज थोड़ी देर के लिए।
(पब्लिश्ड प्लीज़)

September 12, 2011

Brio-genic प्रश्न ???


"लेकिन क्या भारतीय कार ग्राहक इस बात से ख़ुश नहीं होंगे कि इस कार में जो इंजिन लगा है वो वही iVTECहै जो हौंडा सिटी में लगा है, इसकी बनावट ऐसी है जिसे हम जीकॉन बॉडी कहते हैं और जो ज़्यादा सुरक्षित होती है ?" ये सवाल से ज़्यादा उत्सुकता थी, छोटी कारों के ग्राहकों के बारे में एक नए तरीके से जानने की । क्योंकि हौंडा पहली बार भारत में लगा रही है एक ऐसी कार जो छोटी कारों के इलाके में आती है । हौंडा ब्रियो। 
जब तक मेरे कैमरा सहयोगी विशाखापत्तनम के समुद्री किनारे की ख़ूबसूरती को बैकग्राउंड बना कर, हौंडा की नई नवेली हौंडा ब्रियो को सामने रखकर, शूटिंग कर रहे थे तब तक मेरे पास वक्त था कि मैं इस कार के बारे में कुछ बातें कर सकूं, हौंडा कार इंडिया के एक सीनियर अधिकारी के साथ। ज़ाहिर सी बात है कि बातचीत इसकी क़ीमत पर हो रही था जिस पर मेरा कहना था कि इस कार के लिए शुरुआती क़ीमत 3 लाख 80 हज़ार के आसपास होनी चाहिए। जो आंकड़ा लंबे सवाल-जवाब का सबब बना था। दरअसल ब्रियो के बारे में पहला ब्रीफ़ या जानकारी यही आई थी कि हौंडा की आने वाली छोटी कार पांच लाख से कम की होगी और मौजूदा जैज़ से छोटी भी। जिसकी गारंटी तो अभी ही मैं ले सकता हूं, ब्रियो पांच लाख से कम में ही शुरू होगी और साइज़ में जैज़ से छोटी होगी। लेकिन दोनों प्वाइंट का क्या मतलब है आज ? क्या इतना काफ़ी है ? बिल्कुल नहीं।  
ब्रियो में लगा है जैज़ वाला ही 1.2 लीटर i-VTEC इंजिन, 87 बीएचपी की ताक़त है। काफ़ी हद तक जापानी और प्यारे चेहरे वाली ब्रियो अलग ज़रूर दिखती है इस सेगमेंट में। जो ज़रूरी है। साथ में इस कार के अंदर का जगह काफ़ी संतुष्ट करने वाली है। आगे ड्राइवर सीट पर भी और पिछली कतार में भी। जो मुझे काफ़ी अच्छा लगा, कह सकते हैं कि ब्रियो की ये ख़ूबी बहुत पसंद की जाएगी। आजकल जो भी फ़ीचर्स होते हैं इस सेगमेंट में वो सारे हैं। साथ में एक और ख़ूबी मुझे लगी इसकी आसान ड्राइव। पिछले दरवाज़े ( डिक्की) का बड़ा हिस्सा शीशे का है जो रिवर्स करना बहुत आसान कर देता है। तो इन सभी आंकड़ों और फ़ीचर्स के साथ 27 सितंबर की तारीख़ तक ये उतरेगी बाज़ार में। और इन जानकारियों के बाद वापस आते हैं अपने पहले सवाल पर। 
छोटी कारों का बाज़ार ऐसा है जिसे समझना बहुत आसान कभी नहीं रहा है, ऊपर से दिन रात नई रणनीति के साथ उतरने वाली छोटी कारें इसे और कांप्लिकेट कर रही हैं। ऐसे में ब्रियो की क़ीमत क्या होगी ? 
अगर हाल फ़िलहाल में छोटी कारों के बाज़ार को देखें तो तीन सोच या आयाम देख सकते हैं, स्विफ़्ट, फ़ीगो और इंडीका। जिसके बीच में ब्रियो को जूझना पड़ेगा। स्विफ़्ट ने एक ऐसी हैसियत बना रखी है जिसे तोड़ना दूसरी किसी कार के बूते की बात फ़िलहाल नहीं लग रही है। फ़ीगो ने अपनी क़ीमत और किफ़ायत के बल पर एक अलग पैमाना तैयार कर दिया है, वहीं पैसा वसूल कारों के नाम पर इंडीका विस्टा की अलग हैसियत है। सवाल ये है कि ब्रियो कहां खड़ी हो पाएगी (अगर हौंडा सिटी जैसा प्रदर्शन इस सेगमेंट में भी दोहराना है तो ! )? स्विफ़्ट की क़ीमत में वो उतर नहीं  सकती। फ़ीगो को वो छू नहीं सकती। हौंडा का ब्रांड  भारत में प्रीमियम हो चुका है, ऐसे में इंडिका जैसे इलाकों में जाना मुश्किल है। टोयोटा की लीवा, निसान की माइक्रा जैसी कारें इसी कांप्लिकेटेड प्राइसिंग का शिकार हुईं। वहीं ब्रियो के लिए एक और टेंशन है जैज़। जब साढ़े पांच लाख से जैज़ शुरू हो रही है तो उस पैसे में ब्रियो क्यों लूंगा मैं ? तो सवाल है कि टू-बी और नॉट टू बी । 
( प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

September 09, 2011

'NO SPEED LIMIT'


कल के एक लौंच ने कुछ दिनों पुरानी कहानी याद दिला दी...कल लौंच हुई CLS 350 जिसका बेसिक लेखाजोखा कुछ ऐसा है...


The New CLS 350
V6 Petrol 3498 cc engine 
306 hp@ 6500 rpm of power 
370 Nm @ 3500 - 5250 rpm torque
7G-TRONIC (7Speed Automatic Transmission)
0-100kph is reached in 6.1 seconds
top speed at 250 km/hr 
Priced at Rs. 67.67 Lakhs (Ex-Showroom Mumbai)

लेकिन इस लौंच ने अचानक दिला दी उस कार की...एक आवाज़ की , एक ताक़तवर ड्राइव की...और एक निशान की जिसका मतलब  होता है NO SPEED LIMIT :)
जब इस साइन को सड़क पर देखें तो फिर दबा दीजिए एक्सिलिरेटर :)
जो मैंने किया था दूसरी CLS पर ...जिसके नाम के आगे जुड़ा था AMG भी। एक एक्सपीरिएंस....इन केस आप देखना चाहते हैं तो फिर...देख सकते हैं ...इस लिंक पर    असल CLS drive Autobahn पर :)



September 08, 2011

ForMula -फ़ीगोएस्टा



जब हमें प्रोसेस के बारे में सटीक जानकारी होती है तो फिर एंड रिज़ल्ट को भी हम कंट्रोल कर सकते हैं । उस सूरत में अगर रिज़ल्ट गड़बड़ा गया है तो क्या सही करना हैक्या ग़लत हो गया इसके बारे में हमें ठीक-ठीक अंदाज़ा रहता है। लेकिन मामला तब पेचीदा होता है जब नतीजा तो आ जाता है लेकिन हमें पता नहीं चलता कि हमने सही क्या कियाऔर क्या ग़लत किया । और अगर ये आज के वक्त में हो जब हर कारोबार में स्टडी और सर्वे पर इतना ज़ोर हैतो मामला तिलिस्मी हो जाता है।
जैसे एक कार छह साल पहले आईआते ही काफ़ी हंगामा मचायाबिना देखे हज़ारों ने उसे बुक करवा लियातब भी वेटिंग लिस्ट में रहीआज भी है। लेकिन कंपनी भी कई बार अचरच में रही कि आख़िर ऐसी कौन सी ख़ास बात है कि इस कार को हर महीने 11-12 हज़ार लोग ख़रीद रहे हैंसेगमेंट में सात आठ और विकल्प होने के बावजूद इस कार ने मार्केट का पच्चीस फीसदी हिस्सा अपने नाम कर रखा है। ये थी मारुति स्विफ़्ट । जिसका नया अवतार भी हम जल्द देखने जा रहे हैं।
इससे थोड़ी अलग केस स्टडी थी फीगो। फ़ोर्ड ने जब इसे लौंच किया भारत में तो इस कार ने फ़ोर्ड की भारत में जान बचाई । लेकिन इस कार की सफलता अलग-अलग स्टेप में आई थी और जिनमें से ज़्यादातर पर फ़ोर्ड की पकड़ थी। कंपनी ने इस कार को उतारने से पहले मार्केटिंग और आफ़्टर सेल्स पर तो काफ़ी काम किया ही था। एक एक दिन में कंपनी ने दर्जन से ज़्यादा डीलरशिप देश के अलग अलग हिस्सों में खोलेपार्ट-पुर्जों की क़ीमतों को कम किया और ऊपर से इन सभी कोशिशों के बारे में ग्राहकों के बीच भरपेट प्रचार किया । लौंच से पहले प्रोडक्शन फुल-स्पीड में कर दिया जिससे कि ग्राहकों को इंतज़ार ना करना पड़े। और इन सबके बाद ऐसी क़ीमत पर उतारा जिसने ग्राहकों को खींचा अपनी ओर। तुरंत गाड़ियां सड़कों पर दिखने लगींजैसा नुकसान शुरुआत में फोक्सवागन पोलो को हुआजिसकी डिलिवरी में कई हफ़्ते लग रहे थे। जबकि हम सबको पता है कि हम भारतीय ग्राहक जब तक सड़कों पर ढेर सारी कार नहीं देखतेनई कार पर हमारा भरोसा ज़्यादा नहीं होता। भारतीय सड़कों पर लाख से ऊपर फ़ीगो उतर चुकी है।

ख़ैर ये तो दो पहलू हो गए। लेकिन इसके बाद की कहानी भी दिलचस्प है। फ़ोर्डजिसने फ़ीगो के वक्त कई दांव खेले थे और सभी लगभग सही पड़े थे वो ही पलट गई अपने स्टैंड से। नई फ़िएस्टा जो फ़ोर्ड ने लौंच की वो हो गई है अपने सेगमेंट की सबसे मंहगी कार। बेस वेरिएंट की क़ीमतलाख 23 हज़ार से शुरु होती है और टॉप वेरिएंट की क़ीमत 10 लाख 42 हज़ार रु तक जाती है। अब ये क़ीमत कई मामलों में चौंकाने वाली है।
एक वजह तो ये कि फ़ीगो को देखते हुए लग रहा था कि फ़ोर्ड की रणनीति बदल चुकी है भारत में। वो ग्राहकों को पैसा वसूल कार देने का मूड बना चुकी हैऔर फ़ीगो के साथ वो इमेज पक्का भी हुआ थाऔर बिक्री भी ज़ोरदार मिली थी। लेकिन फ़िएस्टा के साथ कंपनी नए रास्ते पर निकल गई है।
दूसरी वजह इस सेगमेंट में होने वाली उथल-पुथल है। एक तो दशक भर से नंबर एक हौंडा सिटी को पछाड़ा वेंटो नेएसएक्स आई डीज़ल अवतार में। इन सबको हिला दिया ह्युंडै की नई वर्ना ने । 20 हज़ार बुकिंग के साथ। फिर हौंडा का बंपर दांव आयासिटी की क़ीमत में66 हज़ार रु तक की कटौती। यानि सेगमेंट का पूरा खेल बदल चुका हैऊपर से कार बाज़ार में मंदी आ गई।
और इस सब बैकग्राउंड में फ़ोर्ड का ये दांव थोड़ा अटपटा लग रहा है। भले ही नई फ़िएस्टा पहले ख़ूबसूरत होकाइनेटिक डिज़ाइन इसे आकर्षक और आक्रामक बनाता हो। कई ऐसे फ़ीचर्स हों जो इस सेगमेंट में पहली बार आए हों। जिसमें सबसे दिलचस्प है इसका वॉयस कंट्रोल फ़ीचर। जिससे आप सिर्फ़ आवाज़ देकर कार के म्यूज़िक सिस्टमफोन एसी वगैरह को कंट्रोल कर सकते हैं। कार में जगह ठीक-ठाक है और चलने में तो मज़ेदार है ही। लेकिन इन सबके बावजूद क्या नई फ़िएस्टा की बिक्री फ़ैंटास्टिक हो पाएगी फ़ोर्ड के लिए। अभी के माहौल में मेरे मन में थोड़ा शक है।
(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

September 06, 2011

Razor Sharp आफ़ रोडिंग !

आप तो वहीं हैं ना जो टीवी पर माइलेज बताते रहते हैं...आपके बताने पर ही  मैंने स्कौर्पियो  ली थी लेकिन मज़ा नहीं आ रहा...और ये लाइन मुझे टेंशन देने के लिए काफ़ी होता, पहले भी बातों के ऐसे थप्पड़ खा चुका था मैं । लेकिन आज नहीं क्योंकि आज मैं कुछ बहुत ही दिलचस्प सवारियों के साथ खड़ा था, जिसे देखकर ही वो सज्जन बीच सड़क पर गाड़ी रोककर मैदान में उतरे थे। वो सवारियां जो शौकीनों की सवारी का अगला लेवल है। ये हैं पोलैरिस की ऑफ़ रोडिंग सवारियां। 


ऑफ़ रोडिंग का मतलब तो साफ़ है कि रोड से हटके। यानि उन जगहों के लिए जहां सड़कें नहीं बनी हैं, ऊबड़-खाबड़ जंगली रास्ते, मुश्किल बर्फ़ीले रास्ते। ये कौंसेप्ट हमारे लिए थोड़ा एलियन है, या कहें कि इस पर कभी ज़्यादा ध्यान हमने दिया नहीं। भले ही अब भारत की सड़कों का एक बड़ा हिस्सा, बनावट और समतल होने के मामले में  दुनिया भर बड़े देशों की बराबरी करता हो लेकिन उन हाईवे से बाहर जो सड़क निकल कर आती है, वो ऑफ़रोडिंग से कम नहीं, जहां पर हमारी आपकी सस्ती-टिकाऊ गाड़ियां तो चल ही जाती हैं, तो ऐसे में ऐसे कौंसेप्ट के बारे में हम क्यों सोचेंगे। ख़ैर मेरे जैसों को तो ज़रूरत भी नहीं। हां विदेशियों की ज़रूरतें अलग होती हैं, लाइफ़स्टाइल अलग होता है, जिसके लिए उन्होंने ये बाइक्स और गाड़ियां तैयार कीं। खेतों में काम करने के लिए, रेत में जाने के लिए, बर्फ़ पर चलने के लिए, जंगली रास्तों पर तेज़ भागने के लिए और आर्मी के इस्तेमाल के लिए। 
बड़े-बड़े चौड़े पहिए जो कीचड़ से लेकर रेत में पकड़ बनाए रखे, हल्की बॉडी जो किसी भी मुश्किल हालत में बोझ ना बने इंजिन के लिए, मज़बूत सस्पेंशन जो तमाम तरीके की उछल-कूद को बर्दाश्त कर सके। और ऊपर से इंजिन जिसकी प्राथमिकता, मुश्किल से मुश्किल रास्तों में बेहतर पावर और टॉर्क देने की है माइलेज नहीं। 
जैसे एटीवी, ऑल टेरेन वेह्किल जिसे कहते हैं क्वाड बाइक भी। वो इसलिए क्योंकि ये चार पहियों की बाइक होती है, हैंडिल के साथ।  रेत, मिट्टी, पत्थर पर आराम से भागती है। इसके कई वर्ज़न भारत में लौंच हुए हैं।
वहीं रेंजर गाड़ियां होती हैं, स्टीयरिंग व्हील के साथ, दो लोगों के साथ, सामान रखने के लिए जगह के साथ। इसके भी कई अवतार आए हैं। 
साथ में आई हैं स्नो-मोबील। अब ये उन देशों के लिए बहुत ज़रूरी हैं जहां साल के ज़्यादातर हिस्से में बर्फ़ जमी होती है। बर्फ़ पर कोई भी सवारी चलाना हमेशा से बहुत पेचीदा काम रहा है, ऐसे में ये सवारियां बहुत काम में आती हैं। 
वैसे है तो ये शौकीनों के शौकीन के लिए। जहां पर इनका ना तो रजिस्ट्रेशन होता है और ना ही लाइसेंस की ज़रूरत होती है, आम सड़कों पर इन्हें चला भी नहीं सकते हैं। और इन सबका मतलब ये कि आप इन्हें भगा सकते हैं, अपने प्राइवेट फ़ार्महाउस में या किसी रिज़ॉर्ट में । 
या आप वो न्यू एज किसान हो, जैसे वो भाई जो इस कॉलम की शुरूआत में मिला था। करोड़ों की ज़मीन का मालिक जो अपनी खेतीबाड़ी के सुपरवाइज़री के लिए पसंद कर सकता है ये एटीवी। 
ये गाड़ियां फ़िलहाल भारत में कुछ रिज़ॉर्ट्स और प्राइवेट फ़ार्म हाउसों में देखने को मिलती हैं।  और उसी चुनिंदा ग्राहकों के लिए पोलैरिस भारत आई है। और आई है कुछ नए ग्राहक बनाने के लिए भी। क्योंकि कंपनी ने ऐलान किया है कि अगले 3-5 सालों में कंपनी भारत में असेंबली प्लांट लगाएगी, और आरएंडडी सेंटर भी खोलेगी। इन सबका मतलब ये कि फ़िलहाल जो सवारियां 2 से लेकर 20 लाख रु की लौंच हुई हैं, वो सस्ती भी हो जाएंगी। तब हो सकता है कि मैं ख़रीद लूं ऐसी सवारी , जिसे अपने गांव ले जा सकूं। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक मैं याद करूंगा अपनी इसी राइड को जो मैंने की थी। ख़ासकर RZR की, जिसे लेकर मैं मिट्टी और कीचड़ में भागा था । कितना मज़ा आया था ये बयान करने के लिए मेरे पास फ़ौंट नहीं है इस कंप्यूटर में :) 


(Published in Prabhat Khabar)


September 05, 2011

खेलेंगे G(55) जान से ....



पहले मज़ाक में कहते थे लेकिन आज की ये सच्चाई है। केवल भारत की नहीं, दुनिया भर  के लोग अब यही पूछ रहे हैं। कितना माइलेज देती है - जिस सवाल से हम हिंदुस्तानी हर गाड़ी को दागते हैं। मारुति ने तो ऐड की पूरी सीरीज़ चला दी इसी सोच के साथ और मुझे तो वो पसंद है ही, मुझे यकीन है आपमें से ज़्यादातर को वो ऐड मज़ेदार लगे ही होंगे जिसमें से एक विजय माल्या की तरह दीखने वाला मालदार इंसान, एक लग्ज़री यॉट ख़रीदने आया है और वो पूछता है कि -कितना देती है, या फिर वो आर्मी जनरल जो रशियन टैंक के माइलेज के बारे में पूछता है कि कितना देती है। कुल मिलाकर ये सच्चाई मान ली गई है कि हम हिंदुस्तानी हर चीज़ में वैल्यू देखते हैं, वो वैल्यू पैसा-वसूल फ़ैक्टर हो सकता है या फिर ब्रांड और लोगो हो। और ये सवाल हर पहलू को कवर करता है। मारुति 800 से लेकर रोल्स रॉयस तक के लिए। 
वैसे ही अमेरिकी ग्राहकों के बारे में ये मानी हुई सच्चाई है कि उन्हें छोटी चीज़ें तो पसंद ही नहीं। यहां तक कि चॉकलेट और बर्गर के साइज़ भी ऐसे होते हैं कि उनमें से एक का नाम है डेथ बाई चॉकलेट । और यही पसंग लागू होती है कारों के मामले में भी। वो तो हाल की तेल क़ीमतों और रिसेशन ने उनका मूड बदला है और अब वो भी छोटी किफ़ायती कारों की ओर आ रहे हैं। नहीं तो हाल हाल तक भीमकाय एसयूवी को छोड़ने में अमेरिकियों के दिल के हज़ारों टुकड़े हो रहे थे, भले ही एक-एक गाड़ी ऐसी जो पूरा तेल का कुआं पी जाए। 
जो हाल अमेरिका का था वही आजकल चीन का हो गया है। चीनी ग्राहक भी अब बड़ी बड़ी गाड़ियों के ज़बर्दस्त फ़ैन हो गए हैं। स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल से लेकर लग्ज़री गाड़ियां तक । जैसे मर्सेडीज़ ने दिलचस्प आंकड़ा दिया कि वहां पर कंपनी की बिक्री एक उल्टे पिरामिड की तरह है। यहां पर मर्सेडीज़ की सबसे मंहगी कारें, सबसे ज़्यादा बिक रही हैं और सबसे सस्ती मर्सेडीज़ सबसे कम। और केवल एक नहीं लगभग सभी बड़ी कार कंपनियों के डिज़ाइनर इसी सोच के साथ काम कर रहे हैं कि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते  इस बाज़ार के ग्राहकों के लिए सबसे अहम है साइज़ । 

लेकिन आज की ये बातचीत कहां से शुरू हुई। दरअसल हाल ही में मैंने चलाई एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। जिसका नाम है मर्सेडीज़ G -55 AMG । भारत में ये करोड़ रुपए से थोड़ी मंहगी है। 
एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। दिखने में आपको पुराने ज़माने की जीप जैसी लगेगी, बनावट, डिज़ाइन और सीट के मामले में। शेप की बात करें तो हो सकता है बोलेरो की याद आए। लेकिन सिर्फ यहीं तक। आगे के आंकड़ें इसके कुछ ज़्यादा ही धमाकेदार हैं । साढ़े पांच लीटर का इंजिन जिसकी ताक़त है 507 हॉर्सपावर की। और जब ये स्टार्ट होती है तो लगता है सड़क को रौंदने वाली है। और जब इसे ड्राइव करना शुरू किया तो लगा कि कोई और ही आत्मा घुस आई है इस रेट्रो सी दीखने वाली जीपनुमा एसयूवी में । ख़ैर इसे लेकर दौड़ाने में ख़ूब मज़ा तो आया क्योंकि इसकी हैंडलिंग आम एएमजी कारों की तरह नहीं है, इसलिए मोड़ने के दौरान इसके पहिए ऑस्ट्रिया के सेल्फेल्डेन के उस वादी में हल्ला मचा रहे थे। लेकिन असल मज़ा आया सड़कों पर। जहां पर भले ही बहुत तेज़ ना चलाया हो लेकिन इसकी आवाज़ ने अचानक मुझे ख़ास बना दिया। और लुक ने लोगों की नज़रें घुमा दीं। ताक़त ऐसी जो माहौल को हिला दे। 
और ऐसे ही वक्त में साथ  में मौजूद मर्सेडीज़ के इंजीनियर ने बताया कि ये गाड़ी कुछ ख़ास ग्राहकों की पसंदीदा गाड़ी हैं। शेख़ों की। वो ग्राहक ऐसे होते हैं जो केवल गाड़ी की साइज़ के ऊपर फ़ैसला नहीं लेते। खाड़ी के देशों के सुपर-रिच को सुपर गाड़ियां ही पसंद आती हैं, जिनकी क़ीमत को ख़ास होती है , साथ में ताक़त के ऊपर भी उनका काफ़ी ज़ोर होता है।  रफ़्तार, ताक़त और सबसे ख़ास एक्सक्लूसिविटी। जिसे वो शान से निकले बुर्ज-अल-अरब की तरफ़। 
कहने का मतलब कि गाड़ियों में पसंद के मामले में भी हर देश के ग्राहकों का एक ख़ास धर्म होता है। जिस पर तमाम आर्थिक और सामाजिक बदलावों का असर पड़ता रहता है। और गाड़ियां केवल अपने ड्राइवरों के बारे में बयान नहीं देतीं, वो उस देश, समाज और वक्त के बारे में भी बहुत कुछ कहती हैं।

(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)