March 25, 2012

‘क्लच’रहित क़िस्सा

ज़माना था जब समझना पड़ता था, ऑटोमैटिक यानि बिना गियर वाली कार, जिसमें बस ऐक्सिलिरेटर दबाने की ज़रूरत होती है, क्लच नहीं और ये तो मानी हुई बात थी कि ऑटोमैटिक की माइलेज कम होती है।  

भारत में विंटेज कारों के शौकीनों की कमी नहीं। बल्कि उन्हीं में से कईयों को देखकर मुझे पता चला कि हमारे देश के राजा-रजवाड़ों की कैसी रईसी थी। बचपन में हिस्ट्री में दिलचस्पी नहीं थी और थोड़ा बड़ा हुआ तो लगने लगा कि डेमोक्रेसी में रजवाड़ों की हालत कितनी दयनीय होती होगी, क्या पता मूलचंद की रेडलाइट पर बगल वाली गाड़ी में कोई युवराज बैठा हो और किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा। ख़ैर डेमोक्रेसी के उस भावुकता के दौर से भी निकलने में ज़्यादा देर नहीं लगी और एक दिन अचानक मुझे राजा रजवाड़ों की एक अनोखी अहमियत पता चली। और वो थी विंटेज कारें, अगर वो नहीं होते तो गाड़ियों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अलग होता, है ना  अगर रजवाड़ों के कारिंदे शौक और जतन से कारों को संभाल कर ना रखते तो इतनी कहानियां हम तक पहुंचती ही नहीं। जैसे बहुत साल पहले एक कार देखकर मैं अचरज में पड़ गया था, 1959 में बनी शेवरले की एक कार जो ऑटोमैटिक थी। उसे देखकर मैं अचरज में पड़ गया था। ये वो ज़माना था जब समझना पड़ता था, ऑटोमैटिक यानि बिना गियर वाली कार, जिसमें बस ऐक्सिलिरेटर दबाने की ज़रूरत होती है, क्लच नहीं और ये तो मानी हुई बात थी कि ऑटोमैटिक की माइलेज कम होती है। ज़ाहिर है ऐसी कारों का तो भारत में सामाजिक बहिष्कार होना ही था। अब स्थिति बदल गईं हैं। लोग बढ़ती ट्रैफ़िक से बचने के तरीके ढूंढ रहे हैं। केवल लग्ज़री कार ग्राहक ही नहीं। कई कार कंपनियां अब छोटी कारों में भी ऑटोमैटिक वर्ज़न भी लेकर आ चुकी हैं। ह्युंडै ने इस मामले में पहले हिम्मत दिखाई थी जब आई 10 भी ऑटोमैटिक वर्ज़न में आने लगी। छोटी कारों में मारुति के पास भी शुरूआत में वैगन आर का ऑटोमैटिक वर्ज़न थे लेकिन बहुत आसानी से मिलते नहीं थे । लेकिन अब उनकी ए स्टार जैसी छोटी गाड़ियों की लगभग 5 फीसदी बिक्री ऑटोमैटिक की होती है, जो एक ठीकठाक संख्या कही जाएगी।

अमेरिका में ऑटोमैटिक वर्ज़न की व्यवहारिकता पर कभी सवाल नहीं था क्योंकि वहां तेल की भरमार रही और तेल सस्ता। और ऑटोमैटिक कार को चलाना आरामदेह तो होता ही है। आज के वक्त में तो और भी, ख़ासकर बड़े शहरों में। जहां के ट्रैफ़िक में क्लच दबाते दबाते घुटने की हड्डी साढ़े तीन साल में ही घिस जाए। इस परेशानी ने भी लोगों को ऑटोमैटिक कारों की ओर धकेलना शुरू किया है। लेकिन साथ में कार कंपनियों के तरफ़ से कई ऐसी कोशिशें हुई हैं जो कार बाज़ार में छोटे से ही सही लेकिन ऑटोमैटिक कारों के सेगमेंट को बढ़ाने में मदद दे रही हैं। जैसे ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के टिकाऊपन पर भारतीय ग्राहकों की शंका को ख़त्म करने के लिए फ़ोर्ड ने अपनी फ़िएस्टा का ऑटोमैटिक वर्ज़न पेश किया, जिसके ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन पर कंपनी ने दस साल या ढाई लाख किमी तक का वायदा किया है, यानि दस साल तक ट्रांसमिशन मेंटेनेंस फ्री। साथ में कंपनी ने माइलेज को भी ठीक-ठाक रखा है। लगभग 17 किमी प्रतिलीटर की माइलेज वो भी ऑटोमैटिक कार में अच्छी मानी जाएगी। और इसके अलावा कंपनी ने इसकी क़ीमत भी बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ाई। हालांकि पहले से ही नई फ़िएस्टा काफ़ी महंगी कार रखी गई थी लेकिन आमतौर पर ऑटोमैटिक कार वेरिएंट मैन्युअल से लाख से ज़्यादा मंहगा होता है लेकिन नई फ़िएस्टा में ऐसा नहीं किया कंपनी ने। 8 लाख 99 हज़ार रु से ये शुरू हुआ है। ख़ैर इस केस में ना सही लेकिन आम तौर पर सभी कार कंपनियों की तरफ़ से ऑटोमैटिक वेरिएंट पेश किए जा रहे हैं ख़ास वर्ग के ग्राहकों के लिए। साथ में कंपनियां उन्हें ज़्यादा भरोसेमंद, सस्ता और किफ़ायती बनाने की भी कोशिश कर रही हैं। जिसे देखकर लग रहा है कि आने वाले वक्त में बहुत से ग्राहक अपने बाएं पैर को आराम देने के लिए ऑटोमैटिक कारों को ख़रीदने वाले वर्ग में शामिल होते लग रहे हैं। 

*Already Published


March 23, 2012

नैनो का पुनर्जन्म ?


वक्त आ गया शायद इस सवाल का, जब आम ग्राहक भी वो सवाल पूछें जो टाटा मोटर्स दरअसल बहुत लंबे वक्त से पूछ रही है। क्या अब वापसी होगी नैनो की ?  और इस सवाल के पीछे की भूमिका हमने देख ली है। मंहगाई बढ़ी है, कई स्तर पर। लोगों ने कार-ख़रीदने के फ़ैसले को या तो टाल दिया है या कैंसिल कर दिया है। कार लोन महंगे हो गए हैं, और जिस ज़रिए से भारत की सारी कारें ख़रीदी जाती हैं, अगर उन्हीं कार लोन की ये हालत हो तो फिर क्या कीजिए...और ये सब क्या कम था कि पेट्रोल की क़ीमतों में आग लग गई। और इस पृष्ठभूमि के बाद तो दो ही रास्ते दीखते हैं, या तो कार ख़रीदें ही नहीं या फिर सस्ती ख़रीदें। क़ीमत में सस्ती और रखरखाव में भी। और इस माहौल में नैनो का याद आना लाज़िमी है। ना सिर्फ़ वो एक छोटी कार है बल्कि सस्ती और किफ़ायती भी।

और ये याद इसलिए भी आएगी क्योंकि हाल में फिर से नैनो की चर्चा शुरू हो गई है। आपने भी देखा ही होगा कि कैसे टाटा मोटर्स एक बार फिर से जान फूंकने की कोशिश में लग गई है नैनो के भीतर। जिसकी एक कड़ी है नैनो का अपग्रेड जिसके भीतर दो तीन तब्दीलियां दिखेंगी। जिनमें सबसे अहम है इंजिन का प्रदर्शन। 2012 वर्ज़न वाली नैनो आई है इंजिन में बदलाव के साथ, बदलाव का मतलब आंकड़ों से है। इंजिन तो वही 623 सीसी वाला है, लेकिन 3 बीएचपी का इज़ाफ़ा ताक़त में दिखा है और साथ में माइलेज भी बढ़ी है। एआरएआई ने एक लीटर पेट्रोल में नई नैनो की माइलेज मापी है 25.4 किमी की । हां क़ीमत में फ़िलहाल कोई बदलाव नहीं दिखा है। मोटे तौर पर देखें तो बदलाव बहुत क्रांतिकारी नहीं हैं, लेकिन हां इसी बहाने हर महीने गिरती बिक्री की जगह लोगों की नज़र इसके बदलावों पर गई है। पर इससे इस कार का पुनर्जन्म हो जाएगा, मुझे नहीं लगता है।
 
(वैसे ये नैनो के आधार पर बनी कॉंसेप्ट मेगापिक्सेल की तस्वीर है)

जिस पुनर्जन्म की संभावना मैं देख रहा हूं वो होगा एक नए इंजिन की बदौलत। नैनो बहुत जल्द आ रही है नए डीज़ल इंजिन के साथ। फ़िलहाल मैं इंतज़ार कर रहा हूं ऑटो एक्स्पो का जहां हो सकता है डीज़ल नैनो दिख जाए। अभी तक की जानकारी के मुताबिक इसमें 1.1 लीटर का इंजिन लग सकता है और इसकी माइलेज काफ़ी बढ़िया हो सकती है। अब बढ़िया तो हम 30 के ऊपर के आंकड़े को ही मानेंगे। जिसके अलावा एक और ख़ास पहलू होगा नैनो डीज़ल की क़ीमत।
हाल के वक्त में पेट्रोल से किसी भी तरीके से पिंड छुड़ाने में लगे ग्राहकों के पास डीज़ल के भी कई विकल्प आ चुके हैं। जिनमें से सबसे लेटेस्ट है शेवरले बीट डीज़ल। जिसमें लगा है हज़ार सीसी या एक लीटर का डीज़ल इंजिन और क़ीमत शुरू हुई है 4 लाख 28 हज़ार रु से । इस कार ने शेवरले की बिक्री में रफ़्तार दे रखी है।वहीं नैनो अपनी क़ीमत की बदौलत एक नए तरीके के सेगमेंट को जन्म दे सकती है। और मुझे ये लग रहा है कि जो काम पेट्रोल नैनो नहीं कर पाई, वो डीज़ल नैनो करेगी। अगले साल मार्च के आसपास की ख़बर सुन रहा हूं इसके लौंच की। और हो सकता है कि एक बार फिर से ये चर्चा में रहे ये कार, और बहस शुरू हो जाए कि पैसेंजर सेगमेंट के लिए यानि आम आदमियों के लिए डीज़ल पर सरकार की सब्सिडी कितनी जायज़ है। डीज़ल कारों औऱ एसयूवी पर टैक्स लगना चाहिए वगैरह वगैरह। लेकिन सच्चाई ये भी है कि नैनो को तो इस तरह के बहस की आदत है।
( थोड़े दिन पहले लिखी थी, *Already Published)

March 19, 2012

what is the point !! republic of public transport ............


हर बहस में एक प्वाइंट ज़रूर आता है जब सारे मुद्दे फ़ेल हो जाते हैं। बारीक तकनीकी पहलू की जगह एक मोटा सा स्थूल सवाल ले लेता है। जिसका जवाब दिए बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। ऐसे ही एक सवाल से मैं फिर रूबरू हुआ। सवाल यातायात का। मोबिलिटी, आवाजाही और ट्रांसपोर्टेशन की तमाम परतों से गुज़रते वो सवाल जो भारतीय समाजशास्त्र के सरोकारों से सरकारों तक जाते हैं। और ये बहुत ही दिलचस्प लगता है ये देखना कि जिस देश में आम-लोग सबसे आम शब्द हैं, जिनके नाम की क़समें प्यार की क़समों से ज़्यादा खाई जाती हैं, वो ट्रांसपोर्टेशन के पूरे विज़न से ग़ायब हैं।

दरअसल साल-दो साल में गांव का चक्कर काटने का रूटीन पिछले कई सालों से टूटा हुआ था। इस बार मौक़ा बना तो निकल लिए। दिल्ली से पकड़ी ट्रेन दरभंगा के लिए, वहां उतर कर मधुबनी के रास्ते पिलखवाड़। दिल्ली की कनकनाती ठंड से निकल अपने गांव की नम सर्द सुबह और बेदम धूप के बीच। दिल्ली से एसी ट्रेन में बैठकर 1200 किमी दूर दरभंगा पहुंचने में जितने रुपए लगे, उतने ही लगे 30-32 किमी दूर मेरे गांव तक पहुंचने के लिए। इंप्रूवमेंट सिर्फ़ इतना था कि पिछली बार जो सफ़र मैंने तीन घंटे में तय किया था वो इस बार डेढ़ घंटे में हो गया। बीच में ललचाने के लिए नैशनल हाइवे 57 नंबर भी आया, मुज़फ़्फ़रपुर को पूर्णिया से जोड़ने वाला। सड़क की क्वालिटी एक सर्प्राइज़ एलिमेंट था। लेकिन इससे पहले कि उस रास्ते से मोह हो जाए, बीच से रास्ता बदलना था। और फिर रास्ते के नाम पर सिंगल लेन, जहां पर गाड़ियां कम और हॉर्न ज़्यादा थे। गाड़ियां अंटी पड़ी थीं, 7 सीटर 15 सीटर बनी थी, मिनी बस में 70 लोग लटके पड़े थे, खुले जीप में ड्राइवर अपना आधी तशरीफ़ बाहर लटका कर ड्राइव कर रहा था।
ये तस्वीर बहुत अलग नहीं थी, जब दिल्ली-जयपुर हाईवे क़स्बों के बीच से गुज़रता है। जहां ना सिर्फ़ क्षमता से चार गुना ज़्यादा लोग किसी भी औसत टेंपो या विक्रम में बैठे दिेखेंगे। भैंसों को ठूस कर लॉरी में ले जाने पर प्रतिबंध लग गया लेकिन लोगों को फट्टों पर बैठ लॉरी में ठुसा हुआ देख कभी अचरज भी नहीं होता। और इस तरह से ये यात्रा एक स्थान विशेष की ना होकर पूरे भारत की हो जाती है। जिसे देखने के लिए आपको मेरी तरह अपने गांव जाने की ज़रूरत नहीं। दिल्ली का बॉर्डर क्रॉस कीजिए और देखिए कैसे ऑटो और विक्रम थ्री-व्हीलर पर दर्जनों लोग अपनी जान पर खेल कर लदे रहते हैं। सामान लेकर लोग सड़क किनारे खड़े मिलेंगे, इस इंतज़ार में कि कोई उनकी भी सुध ले, 12 किमी जाने के लिए तीन सौ रु लेकर ही सही।

इतने सालों से अनगिनत गाड़ियों को जिन पैमानों पर मैंने पत्रकार के तौर पर परखा है, वो सारे पैमाने इस जगह पर जाकर फेल हो जाते हैं। स्पीड, संतुलन और सुरक्षा की बात तो लागू ही नहीं होती। इनकी जगह दूसरे सवाल ले लेते हैं, जैसे ये कि गाड़ी में कितने लोग भरे जा सकते हैं, सस्पेंशन की मज़बूती का एक ही पैमाना ये कि 15 लोगों को भरने के बाद मेरे घर से निकल कर पक्के रास्ते पर पहुंचने से पहले ये टाटा सूमो ईंट वाले रास्ते में धंस तो नहीं जाएगी, पलट तो नहीं जाएगी। इंजिन प्रदर्शन एक बेतुका जुमला हो जाता है जब ओवरलोडेड गाड़ी की रफ़्तार को ख़राब सड़क जैसे स्पीड गवर्नर ने सीमित कर रखा था। और उस माहौल में जब शरीर आड़ा-तिरछा हो रहा था, सोच सीधी हो रही थी, कि पर्सनल मोबिलिटी और पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को लेकर हमारे देश में सोच, विज़न और बहस कितनी एकतरफ़ा है।

भारत को भविष्य का सुपरपावर माना जा रहा है। सामरिक से ज़्यादा आर्थिक पैमाने पर। देश में कई क्रांतियां आ गईं, आईटी, मोबाइल, हरित, श्वेत, बीपीओ और ना जाने क्या-क्या। सबके लिए मोबाइल से लेकर लैपटॉप तक की कोशिश हो रही है। यहां तक कि सबके लिए कार भी। यातायात के नाम पर वाकई एक आम धारणा यही हो गई है। पर्सनल गाड़ी। फिक्र तब होती है जब आम लोगों की धारणा की तरह सरकारी महकमें में भी सारी चर्चाएं पर्सनल गाड़ियों की ही सुनने को मिलती हैं। लखटकिया, किफ़ाइती, इलेक्ट्रिक कार, डीज़ल इत्यादि। क्यों नहीं पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को लेकर एक राष्ट्रीय बहस और पहल शुरू होती है.. जिससे हर तबके का इंसान आरामदेह तरीके से अपनी मंज़िल तक जल्दी औऱ सुरक्षित पहुंचे । ऑटो बाज़ार, स्मॉल कार, महंगाई, पेट्रोल की क़ीमत से बहस बस कॉरिडोर और पब्लिक ट्रांसपोर्टकी तरफ़ क्यों नहीं जा रही है। क्या पहले ही बहुत देर नहीं हो गई है ? क्या  ट्रांसपोर्टेशन के मास्टरप्लान मेंराष्ट्रीय बहस में आम से आम हिंदुस्तानियों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। क्या इनके लिए भी रतन टाटा सपना देखेंगे। क्यों नहीं इस मुद्दे को बुनियादी तौर पर सुलझाने की कोशिश की जाए। क्यों नहीं हर हिंदुस्तानी को टाइम पर चलने वाली सुविधाजनक पब्लिक ट्रांसपोर्ट दी जाए, जिसमें थोड़ा आराम तो हो ही, सुरक्षित भी हो। जिससे कि मैं भी अपनी गाड़ी को बंद करके रख दूंऔर अगर कार नहीं ख़रीदी है तो केवल ज़रूरत के लिए ना लूं। भारत में सभी कार कंपनियों को भविष्य दीख रहा होये अच्छी बात है, लेकिन कंपनियों के  भविष्य और देश के लोगों के भविष्य के बीच अंतर समझने की ज़रूरत है। सिर्फ़ कारें कभी भी हमारा समाधान नहीं हो सकती हैं, किसी की भी नहीं हुई हैं। पहले ही इतनी देरी हो चुकी है कि ख़ामियाज़ा हम भुगत ही रहे हैं। भारत, जहां पर साल में सवा लाख लोग सड़कों पर मारे जाते हैं,    भारत जहां की आबादी घटने वाली नहीं लग रही है और सड़कों का आकार बढ़ने नहीं वाला है। चीन जहां भारत से ज़्यादा आबादी और गाड़ियां हैं वहां पर लोग कम मरते हैं,और हर साल वो संख्या घट रही हैजबकि भारत नंबर एक तो है हीये संख्या घट भी नहीं रही। घट रहा है तो सिर्फ़ वक्त।
(ये मैंने तब लिखा था जब दिल्ली की बीआरटी पर केवल बसें चल सकती थीं, अब कोर्ट के आदेश के तहत आम गाड़ियां भी उसी पर से जाएंगी... यानि ये BRT एक्सपेरिमेंट भी फ़ेल। )
*Already Published

March 10, 2012

Ladies Spl :)



घड़ी, मोबाईल और शैंपू की तरह महिलाओं के लिए ऑटोमोबील बाज़ार में अलग से ख़ास कोशिश नहीं होती। यहां पर प्रोडक्ट कुछ सौ या हज़ार के नहीं होते, लाखों के होते हैं, तो ऐसे में कम ग्राहक ऐसे होते हैं जो जेंडर स्पेसिफिक गाड़ी लें। कंपनियों की तरफ़ से, बहुत कम ऐसी कोशिशें देखने को मिली हैं जो केवल महिला ग्राहकों के लिए हो। ऐसे ही कुछ कार मॉडलों में कंपनियों की ऐसी कोशिशें देखने को मिली थीं। मारुति ने अपनी एस्टिलो में ऐसी ही कोशिश की थी, एक अजीब से रंग फ़्यूज़न पर्पल के साथ। एक तो वो रंग इक्का-दुक्का ही नज़र आता है, ऊपर से पुरूष ड्राइवर ही उसके अंदर दिखे हैं  । एक वक्त में लग्ज़री सेगमेंट में महिला ग्राहकों की बढ़ोत्तरी के रिपोर्ट आए थे लेकिन उसके पीछे भी टैक्स बचाने की कवायद ज़्यादा थी। पति लोग अपना टैक्स बचाने के लिए दूसरी कारों को पत्नियों के नाम पर ख़रीदते थे। कुल मिलाकर विदेशी बाज़ारों के तरह अभी भी भारतीय बाज़ार उस तरीके से बारीक सेगमेंट वाले नहीं हुए हैं, जहां पर महिलाओं के लिए अलग से प्रोडक्ट लाने के बारे में सोचें या फिर रिस्क लें। विदेशों में कई गाड़ियों की पहचान ऐसी है। महिलाओं की एसयूवी, महिलाओं की हैचबैक कार वगैरह। भारत में अभी ऐसा नहीं। कुछ साल पहले जब मैंने ड्राइवर की तरफ़ सन वाइज़र यानि धूप रोकने वाले पट्टे के पीछ जब मिरर लगा देखा तो चौंका था। लेकिन ये साफ़ बता रहा था कि महिलाएं अब पहले से कहीं ज़्यादा गाड़ी ड्राइव कर रही हैं और कंपनियां उनके लिए तैयार हो रही हैं। गाड़ियां अब पहले से ज़्यादा यूनिसेक्स होती जा रही हैं। ऐसे फ़ीचर्स लगाए जा रहे हैं जो महिलाओं के लिए अहमियत रखते हैं। वैसे टू-व्हीलर्स की बात थोड़ी अलग है। एक तरफ़ इन सवारियों ने महिलाओं या कहें ख़ासकर लड़कियों के ऊपर असर डाला है वहीं ये सेगमेंट भी बहुत महिला सेंट्रिक हुआ है। स्कूटी जैसी सवारियों ने महाराष्ट्र से लेकर यूपी तक की कॉलेज जाने वाली लाखों लड़कियों को एक आत्मनिर्भरता का एहसास दिया है। जो इन छोटे ऑटोमैटिक स्कूटरों की बिक्री से भी साफ़ है। इसे एक उभरता हुए सेगमेंट भी माना जा रहा है जहां नए लौंच भी हो रहे हैं जैसे यामाहा जल्द लड़कियों के लिए 'रे' ला रही है। और स्ट्रगल यहां भी है। हीरो की प्लेज़र को काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी थी, बावजूद इसके कि वो सिर्फ़ महिलाओं को ध्यान में रख कर लाया गया प्रोडक्ट था। उसका टैगलाइन भी ऐसा ही था, व्हाई शुड ब्वायज़ हैव ऑल दि फ़न” । एक ऐसी चुनौती जो महिलाएं पुरुष ड्राइवरों को हमेशा देती हैं, एक ऐसी लड़ाई जो नई नहीं है। ये एक मार्केटिंग मंत्र भी था और एक सामाजिक स्टेटमेंट भी। उस लड़ाई के सिलसिले में जो हो महिला बनाम पुरुष। कौन बेहतर है 
आज की तारीख़ में जब कंधे से कंधा मिला कर चलना घिसा –पिटा मुहावरा हो चुका है, महिलाएं उससे कहीं आगे जा चुकी हैं, ऊपर से मेट्रोपॉलिटिन कल्चर में जब महिलाओं की ज़रा सी आलोचना से मेल शॉवनिस्ट की कैटगरी में जाने का ख़तरा होता है, तो ऐसे में कई बार मैन वर्सेज वूमन की लड़ाई दिलचस्प इलाकों में जाती है। जिनमें से एक अखाड़ा है सड़कें। ऐसी ही एक लड़ाई का प्रोग्राम संस्करण इंटरनेट पर देख रहा था जो मेरे मित्र ने तैयार करके फेसबुक पर लगाई थी। डायलोग की धींगामुश्ती चल रही थी महिला और पुरुष ड्राइवरों के बीच। चूंकि ये सब कॉलेज कैंपस के इंटरव्यू थे तो तेवर नया था, लेकिन दलीलें वही सब पुरानी। स्लो चलाती हैं, हॉर्न बजाने पर रास्ता नहीं देतीं, इनको पार्किंग नहीं आती ...वगैरह वगैरह। और ऐसे में मुझे याद आया वो इंटरव्यू जो मैंने कुछ साल पहले किया था। लेडी ड्राइवरों का ग्रुप था, जो एक महिला कार रैली में हिस्सा लेने जा रही थीं और उनका उत्साह देखने लायक था। जहां तक याद आता है सभी की ये पहली कार रैली थी, तो मोटरस्पोर्ट्स में हिस्सा लेने का एक जोश था। घर का काम छोड़ एक कांपिटिशन में ख़ुद को साबित करने का एक जज़्बा और फिर टीवी इंटरव्यू भी तो उन्हें ये यकीन सा था कि सही रास्ते निकली हैं वो। सवाल-जवाब वही रेडीमेड थे जो शॉर्टकट इंटरव्यू के कटपीस होते हैं- महिला होते हुए भी ...? घर में सपोर्ट कैसा है...? सड़क पर लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होती है इत्यादि। बाकी कुछ ज़्यादा याद नहीं सिवाय एक बात के जो उनमें से एक ने कही थी- उनमें से एक अपनी कार में एक बोर्ड लेकर चलती थीं जिस पर बड़े अक्षरों में सॉरी लिखा हुआ था। पता नहीं क्यों सुन कर काफ़ी अजीब सा लगा। पता नहीं चल रहा था कि इस बात पर हंसा जाए या अचरज हो। सीधा रिएक्शन तो हंसने का ही था लेकिन वो सॉरी वाला पट्टा उससे कहीं आगे तक ज़ेहन में रहा। 
हर रोज़ सड़क पर एक से एक ड्राइवर मिलते हैं, एक अधेड़ उम्र के अंकल जिन्होंने ज़िंदगी स्कूटर से शुरू की तो आज अपनी हौंडा सिविक भी वैसे ही चलाते हैं, बिना इंडीकेटर दिए, किसी भी लेन में घुसा कर और अचानक चलती ट्रैफ़िक के बीच ब्रेक लगाकर रास्ता पूछ लेते हैं। वो नौजवान भी मिलते हैं जिनको उनके बाप ने लगता है कि बर्थडे गिफ़्ट के तौर पर कार का हॉर्न लगा कर दिया है और वो कार का ब्रेक लगाते ही हॉर्न बजाने लगते हैं। वो सफ़ेद हरियाणा नंबर की टैक्सियां भी मिलती हैं जो तेज़ रफ़्तार में चलती हैं, बिना इशारे के आपके आगे आ जाती हैं, कभी भी दाएं या बाएं चली जाती है बिना किसी अपराध बोध के। सारी कलाबाज़ियों के बाद इनके ड्राइवर आंखें दिखा के भी जाते हैं। लेकिन इनमें से किसी को आजतक सॉरी बोलते नहीं सुना। ऐसे में सॉरी लिखा हुआ एक पट्टा क्या सच्चाई दिखाता है। 
दरअसल गाड़ियां और ड्राइविंग दो ऐसी चीज़ हैं जिन पर पुरुषों ने शुरूआत से टाइटल सूट कर रखा है, अपना इलाका घोषित कर रखा है और महिलाएं इनमें घुसे ये उन्हें ज़्यादा पसंद आता है। और ये भाव महिलाओं में भी बहुत दिखता है, बहुत सी महिलाएं एक क्षमाप्रार्थी के भाव से सड़कों पर गाड़ी चलाती मिलती हैं। मानो थोड़ी जगह दे दो मैं निकल जाउंगी। और अगर कोई कार ग़लत चलती दिखे सड़क पर तो आमतौर पर पुरुष ड्राइवरों का रिएक्शन होता है (मेरा मतलब मेजोरिटी से है, जेनरलाइज़ेशन नहीं) -कोई मैडम चला रही होंगी। 
ये सब उस देश में जहां पर ज़्यादातक ड्राइवर सर्टीफ़ाइड बुरे ड्राइवर हैं, ना सिर्फ़ सड़कों पर मरने वाले लोगों के हिसाब से, बल्कि ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने के हिसाब से भी, जिस देश में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना उतना ही आसान है जितना डीटीसी की टिकट कटाना है। जहां पर ड्राइविंग के टेस्ट के नाम पर गाड़ी नहीं, कलम चलाई जाती है, इंस्ट्रक्टर की जगह दलाल मिलते हैं, वहां से लाइसेंस लेने वाले हम हिंदुस्तानी पुरूष अगर महिलाओं को बुरा ड्राइवर बताते हैं तो विडंबना वाकई छोटा शब्द लगने लगता है। 
* Already Published