February 18, 2013

When We Saw Honda Amaze ...


पहली नज़र में कैसी लगी अमेज़ ??


आख़िरकार वो कार चलाने का वक्त आ गया था जिसके लिए ग्राहकों और पत्रकारों से बहुत ज़्यादा इंतज़ार कंपनी को था। और कार भी क्या कहें असल मुद्दा तो इंजिन था। जिसके इंतज़ार में हौंडा कार कंपनी ने भारत में ना जाने कितनी बेचैन रातें काटी हैं। और इसी वजह से कार भले बी बिल्कुल नई है, लेकिन ज़्यादा चर्चा इसके इंजिन की हो रही थी। तो ये है कहानी हौंडा कार कंपनी की ही है। हाल के समय में डीज़ल का सबसे ज़्यादा दर्द झेलने वाली कार कंपनी। हर सेगमेंट और हर ग्राहक जब डीज़ल की तरफ़ मुंह मोड़ रहे थे, नए नए डीज़ल विकल्प देख रहे थे, तब कंपनी डीज़ल इंजिन बनाने में ही लगी थी। और उसका नतीजा अब दिखा हमें जापान में। जहां हम पहुंचे थे हौंडा की लेटेस्ट नई डीज़ल इंजिन वाली छोटी सेडान कार ' अमेज़' को चलाने। ग्राहकों को तो ये कार अगले साल दिखेगी, क्योंकि हमने जिस कार को चलाया वो अमेज़ का प्रोटोटाइप है। यानि कार का वो नमूना जो बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन में आने से पहले तैयार होता है। इसके लिए हम पहुंचे थे हौंडा के आर-एंड-डी सेंटर में। जापान के तोचिगी प्रांत में हौंडा के इस आरएंडी सेंटर पर कई दिलचस्प रेसट्रैक हैं, और इसका नाम है ट्विन रिंग मोटेगी।




कार के बारे में समझना है तो ब्रियो कार को याद कीजिए। उसी की बुनियाद पर हौंडा के इंजीनियरों और डिज़ाइनरों ने लंबी कार बनाई है। यानि मोटे तौर पर तो डिक्की के साथ ब्रियो समझ सकते हैं। यानि स्विफ़्ट से डिज़ायर बनी और टोयोटा ने इटीयोस बनाया। छोटी से बड़ी बनाई कार। कंपनी ने डिज़ाइनर्स ने इसमें जोड़ी है एक डिक्की, यानि ये बनने वाली है सिटी से निचले सेगमेंट में हौंडा की छोटी सेडान कार । और इसे देखने पर भी ब्रियो की ही याद आती है। कार की शक्ल उसी से मिलती जुलती है। लेकिन पिछले हिस्से मे जाते जाते फर्क महसूस होता है। जहां पर छोटी कार में एक डिक्की लगाने की कोशिश कई बार मामला गड़बड़ कर देती है, जैसे पुरानी डिज़ायर  में साफ़ लगता था लेकिन अमेज़ के पिछले हिस्से पर क्रिएटिविटी का इस्तेमाल तो हुआ है। अब चूंकि ये कार 4 मीटर से छोटी बनानी थी तो पिछला हिस्सा थोड़ा छोटा तो रखना ही था। हालांकि स्मॉल कार के तहत छूट पाने के लिए भले ही हौंडा ने इस कार को 4 मीटर से छोटा बनाया हो, लेकिन इस कार के अंदर की जगह इसे बहुत पसंदीदा बना सकती है ग्राहकों के बीच। सवाल सिर्फ़ इसकी क़ीमत का है, हौंडा अपने पुराने इमेज के हिसाब से ना करके अगर डिज़ाइर को देखते हुए इसकी क़ीमत तय करती है हौंडा तो फिर मारुति को ज़ोरदार झटका दे सकती है।


लेकिन इस कार का एक हिस्सा वो भी है जो आने वाले वक्त में हौंडा के लिए भारत में ख़ुशख़बरी ला सकता है। वो है 1.5 लीटर का डीज़ल  इंजिन। अब फिलहाल तो इस इंजिन के बारे में कुछ तकनीकी जानकारी नहीं मिली है। लेकिन ये ज़रूर दावा कर रही है कंपनी कि ये अपने सेगमेंट में सबसे किफ़ायती इंजिन होगा। इसे अलग अलग ट्यून करके कंपनी अपने पूरे पोर्टफ़ोलियो को डीज़लमय कर सकती है। तो फिलहाल यही कहा जा सकता है कि कार बाज़ार जहां स्ट्रगल कर रहा है वहां हौंडा कार कंपनी लेट ही सही, अपने लिए नई गुंजाइश खोज रही है। 

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February 12, 2013

For Harley Lovers and others


हार्ली की नई फ़ैटबॉब


बार बार बात होती है दो तरीके के भारत की...तो बाज़ार में भी इसकी झलक ज़रूर दिखती है। एक तरफ़ हम गाड़ियों की बिक्री को गिरते हुए देख रहे हैं, तो उसी में से स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल की बिक्री ज़ोरदार बढ़ रही है। एक तरफ़ लोग ज़्यादा से ज़्यादा प्रैक्टिकल और किफ़ायती गाड़ी की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शौकीनों की तादाद भी कम नहीं हो रही है। बढ़ ही रही है। जैसे इस हफ़्ते एक लौंच देखने को मिला दिल्ली में। नामी अमेरिकी क्रूज़र बाइक्स बनाने वाली कंपनी हार्ली डेविडसन लेकर आई है अपनी सबसे लेटेस्ट फ़ैटबॉब। दरअसल ये दो मोटरसाइकिलों का रिमिक्स है। हार्ली डेविडसन अपनी मोटरसाइकिलों को पांच फ़ैमिली में बांटती है। बनावट, फ़ीचर्स और इस्तेमाल के हिसाब से। इन्हीं में से हार्ली के दो मोटरसाइकिल हैं, जो पहले से मौजूद हैं, फ़ैटब्वाय और स्ट्रीट बॉब। इनमें से फ़ैटब्याव के चाहने वाले तो बहुत हैं, जो तब नामी हुआ था जब आर्नौल्ड श्वार्ज़ेनेगर ने सुपरहिट फ़िल्म टर्मिनेटर में चलाया था। भारत में फ़िलहाल इस बाइक की क़ीमत थोड़ी ज़्यादा है। कंपनी ने माना कि ये दोनों बाइक्स काफ़ी पसंद रहे हैं, लेकिन ग्राहक की तरफ़ फ़ीडबैक मिला। तो ऐसे ही कुछ फीडबैक के बाद कंपनी ने इस मोटरसाइकिल को लाने का फ़ैसला किया। फ़ैटब्वाय और स्ट्रीट बॉब को मिलाकर कहानी बनी है फ़ैटबॉब की।
ये मोटरसाइकिल हार्ली की वो छठी बाइक है, जो सीकेडी अवतार में आई है। यानि कंप्लीटली नॉक्ड डॉउन वर्ज़न में। जिसे हार्ली अपने हरियाणा स्थित असेंबली प्लांट में असेंबल करेगी। जिससे कि इस मोटरसाइकिल को ड्यूटी में छूट मिल पाए और इसकी क़ीमत कम रखी जा सके। लेकिन मज़े की बात ये कि इस छूट के बाद क़ीमत क्या हुई है, वो भी जान लीजिए। इसकी एक्स शोरूम क़ीमत है 12 लाख 80 हज़ार रु मात्र। जीहां लंबी कार, या छोटी एसयूवी की क़ीमत में मिल रही है एक हार्ली मोटरसाइकिल।



इसमें लगा है 1600 सीसी का इंजिन। जो ऑल्टो से डबल् साइज़ का है, और इसका टॉर्क 126 एनएम है। यानि बड़ी गाड़ियों से बेहतर टॉर्क वो भी एक दुपहिए में । तो सोचिए कि ताक़त का एहसास कैसा होता होगा । और इसी तजुर्बे को ख़रीदने वालों की संख्या बढ़ रही है। तो फिर से मुद्दा वही आ गया जिससे शुरू किया था। शौकीनों की बढ़ती तादाद। और ये शौक ही जो किसी को इस क़ीमत की बाइक ख़रीदने की सोचे। जो हो भी रहा है। सोचिए कि कैसे हार्ली ने लगभग ढाई साल के वक्त में दो हज़ार बाइक्स बेच दी है। और वो भी तब जब हार्ली मोटरसाइकिल की क़ीमत शुरू ही साढ़े पांच लाख के ऊपर होती है। और ये इसलिए भी बड़ा आंकड़ा है क्योंकि भारत में सुपरबाइक्स या बड़ी इंपोर्टेड मोटरसाइकिलों की बिक्री बहुत कम रही है। जापानी कंपनियों यामाहा, हौंडा, सुज़ुकी से लेकर इटैलियन डुकाटी तब बहुत बड़ी संख्या में बिक्री नहीं देख रहे थे। कुछ समय पहले तक इस सेगमेंट की सालाना बिक्री 500 -1000 बाइक्स की भी नहीं मानी जा रही थी। जिसमें एक वजह ये ज़रूर है कि ज़्यादातर बाइक्स वही थे जो सुपरबाइक्स थे, यानि बहुत ताक़तवर स्पोर्ट्सबाइक्स, जिन्हें संभालना आसान नहीं। लेकिन अगर हार्ली की बिक्री के आंकड़े को देखें तो लग रहा है कि लाखों की मोटरसाइकिलें अब नॉर्म बन चुकी है, ग्राहकों को स्वीकार हो चुकी हैं। अगर काम की सवारी उन्हें मिले तो भारतीय ग्राहक कार की क़ीमत में मोटरसाइकिल ख़रीदने में नहीं झिझक रहे।


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Cars on Fire ....


जब नई टेक्नॉलजी से कारें ज़्यादा से ज़्यादा सेफ़ बन रही हैं फिर क्यों जल रही हैं कारें ?

एक बार फिर से हमने दिल्ली में एक ख़बर देखी है, अगर बारीकी से देखें तो दिल दहलाने वाली। दिल्ली के बीचोबीच गुलाबी बाग के एक सीएनजी स्टेशन पर खड़ी एक कार के बोनेट के भीतर से धुआं निकलना शुरु हो गया। किसी देखने वाले ने कहा कि छोटा धमाका हुआ किसी ने कहा नहीं हुआ। लेकिन उसके बाद जो भी हुआ वो सबने देखा। धुआं आग की लपटों में बदला और कार पूरी तरह से धू-धू कर जलने लगी। सीएनजी स्टेशन पर हड़कंप मच गया। वहां सीएनजी भरवाने आईं कार-ड्राइवरों में खलबली मच गई और वो अपनी अपनी कारों को लेकर बाहर की ओर भागे। कार ड्राइव कर रही महिला की किस्मत अच्छी थी कि वो वक्त रहते कार से बाहर निकल आई और बच गई। और बाकियों की किस्मत अच्छी थी कि कार में आग लगने के बावजूद सीएनजी स्टेशन को कोई नुकसान नहीं पहुंचा और एक दुर्घटना बड़ा हादसा बनने से बच गई। कार में आग लगने की ये कोई पहली घटना नहीं थी  और अब दिल्ली के आसपास के इलाकों की बात करें तो अनोखी भी नहीं रही है। आए दिन कार में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। और कई बार जानलेवा भी। जब कार में आग इतनी तेज़ी से लगती है कि कार के अंदर बैठे सवारों को निकलने का वक्त भी नहीं मिला। और जब ध्यान से देखें तो ये घटनाएं वाकई ज़्यादा होने लगी हैं।
जिस ज़माने में हम बड़े हुए थे उस दौरान गाड़ियों में आग लगने की घटनाएं शायद ही ऐसे सुनने को मिलती थीं। और वो याद करके सवाल उठता है ज़हन में कि आख़िर क्यों कारें इतनी असुरक्षित होती जा रही हैं। ऐसा नहीं कि अख़बारों और टीवी चैनल्स की वजह से ये संख्या ज़्यादा लगती है । सड़कों पर चलते हुए आपको हफ़्ता-दस दिन में एक ना एक गाड़ी जली हालत में सड़क किनारे दिख जाती है। जो एक चौंकाने वाली सच्चाई है। ऐसा कैसे हो रहा है कि एक तरफ़ कारें पहले से ज़्यादा सुरक्षित तो हो रही हैं, ब्रेक, एयरबैग, ट्रैक्शन कंट्रोल, बेहतर बॉडी और क्रेश टेस्टिंग के साथ, लेकिन दूसरी ओर एक बहुत ही बुनियादी सवाल का जवाब अब भी नहीं मिल पा रहा है। कारों में लगने वाली आग। याद होगा कि नैनो में लगी आग ने उसकी छवि कितनी ख़राब की। लेकिन सच्चाई है कि हर कंपनी की कार में आग लग रही है।

कई बार तो रिपोर्ट आती है कि कार का सेंट्रल लॉकिंग सिस्टम ही लॉक हो जाता है। यानि पैसेंजर आग लगने की हालत में अंदर से दरवाज़ा नहीं खोल पाते और अंदर फंस कर जान गंवा देते हैं। हालांकि इस घटना को कई कार के इंजीनियर ग़लत भी बताते हैं। उनके हिसाब से सेंट्रल लॉकिंग आग लगने की हालत में भी लॉक नहीं होती और लोग किसी और वजह से फंसते हैं । जानकार मानते हैं कि कारों के अंदर प्लास्टिक का इस्तेमाल हद से ज़्यादा बढ़ गया है और ऐसे में एक आग फैलने की रफ़्तार बहुत बढ़ जाती है। चाहे वो बोनेट के भीतर हो या डैशबोर्ड। कार कंपनियां कई बार कहती है कि लोकल बाज़ार से सीएनजी किट फिट करवाने से आग लगती है, कई सीएनजी लगाने वाली कंपनियां कहती हैं ऑथोराइज़्ड फिटिंग सेंटर से फिट ना करवाने से आग लगती है। कई बार कार ग्राहकों पर लापरवाही का आरोप लगता है, कि ध्यान से मेंटेनेंस ना करने पर आग लग जाती है। हालांकि जिस घटना का मैंने पहले ज़िक्र किया उस कार मालिक का दावा था कि पिछले हफ़्ते ही उसने कार की सर्विसिंग करवाई थी।
लेकिन यहां पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच जो मुद्दा ठोकर खा रहा है वो है कारों में आग। यानि सरकार को इस मुद्दे पर अब पहले से कहीं गंभीरता से सोचना चाहिए। क्यों आग की घटनाएं बढ़ी हैं, किसकी ग़लती है ? क्या सुरक्षित इंजीनियरिंग की अनदेखी हो रही है ? क्या कंपनियां सस्ती और असुरक्षित पार्ट-पुर्ज़े लगा रही हैं ? क्या ग्राहक वाकई लापरवाही ख़ुद कर रहे हैं और अपनी जान से खेल रहे हैं ? और ये मामला केवल सीएनजी एलपीजी का नहीं, क्योंकि बाकी आम पेट्रोल-डीज़ल कारें भी तो पहले से कहीं ज़्यादा आग पकड़ रही हैं। तो सवाल सबकी सुरक्षा का है...जवाब का बहुत समय से इंतज़ार है।

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February 11, 2013

Year of Small SUVs ?



नए साल की शुरूआत वैसी नहीं जो बहुत ही ज़ोरदार ऐलान के साथ आई हो। गाड़ियों की दुनिया कैसे बदलेगी इस साल इसका अंदाज़ा तो नहीं मिल सकता है इस महीने से..क्योंकि सभी कंपनियां तो इस महीने में क़ीमत बढ़ाने में लगी हैं। लेकिन अगर इस साल के बाज़ार का ट्रेंड पढ़ना है तो उसके सुराग़ पिछले साल से मिल सकते हैं। जब दो घटनाएं हुई थीं, एक तो कई कंपनियों ने अपनी गाड़ियों का ऐलान किया था जो 2013 में आने वाली थीं और साथ में एक लौच। हम बात रिनॉ के डस्टर की कर रहे हैं। रिनॉ ने पिछले साल इसे प्रदर्शित भी किया और लौंच भी। कंपनियों ने एक साथ ही इस सेगमेंट को शायद पढ़ना शुरू किया था और लगभग सभी ने एक साथ इस पर काम करना शुरू किया। ये कौंपैक्ट एसयूवी का बाज़ार है। जहां पर रिनॉ के साथ फायदा ये था कि उसके पास छोटी स्पोर्ट्स यूटिलिटी गाड़ियों में एक प्रोडक्ट रेडी था। और डस्टर ने कुछ ऐसी सफलता देखी है जिसने कंपनी को भारत में पहली बार राहत मिली है। और उसने आने वाले सभी प्रोडक्ट के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। जहां पर एक तो लगे हाथों आ गई , महिंद्रा ज़ाइलो का मिनी वर्ज़न -क्वांटो। जो एक एमयूवी में से निकाली गई छोटी एसयूवी नुमा थी। लेकिन अभी भी कुछ ऐसे प्रोडक्ट आने बाकी हैं , जिन्हें देखते हुए लग रहा है कि साल 2013 शायद छोटी एसयूवी का साल रहेगा। यानि वो गाड़ियां जो एक एसयूवी के तौर पर तैयार और डेवलप की गई हों। जिसमें सबसे पहले लग रहा है कि फ़ोर्ड की ईकोस्पोर्ट कहीं ना कहीं कंपनी के लिए वो  कर पाएगी जो फीगो ने किया था। 



अमेरिकी कार कंपनी के लिए एक ऐसे सेगमेंट को खोलेगी जिसकी आस फोर्ड का हेडक्वार्टर भी लगा रहा होगा। इस गाड़ी को लेकर कंपनी की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कंपनी ने पेट्रोल इंजिन पर भी ख़ास काम किया है, जबकि एसयूवी में आमतौर पेट्रोल इंजिन की बात कम ही सोची जाती है और आज के वक्त में तो और भी नहीं। ख़ैर । तो एक छोटे पेट्रोल इंजिन के अलावा और क्या पैकेज में लेकर आ सकती है फ़ोर्ड ये तो देखने वाली बात होगी, क्योंकि इस साल अगर बहुत से लोगों में किसी लौच को लेकर दिलचस्पी है तो यही गाड़ी होगी। इसके अलावा एक और छोटी सवारी मारुति की भी होगी, जो अगर इस साल आ गई तो फिर सेगमेंट में नए तरीके का उछाल हम देख पाएंगे। एक्स ए ऐल्फ़ा की कहानी को हम कौंसेप्ट के तौर पर ही देख पाए हैं। बाज़ार की रफ़्तार और अपने गिरते मार्केट शेयर को देखते हुए मारुति के लिए बहुत ही ज़रूरी है कि वो अपनी छोटी एसयूवी लेकर आ जाए। तो बिल्कुल नए तरीके की मारुति सवारी बाज़ार को कैसे हिलाती-डुलाती है ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन एक्स ए ऐल्फ़ा के बारे में सुगबुगाहट अभी नहीं लग रही है। देखिए कब आती है। लेकिन सिर्फ़ दो गाड़ियों से साल का ट्रेंड नहीं बन सकता है। यानि और भी लौंच इस सेगमेंट में ज़रूर होंगे। जिनमें से एक निसान भी होगी।



 रिनॉ की डस्टर को निसान के नाम से लौंच करने की कोशिश कंपनी काफ़ी दिनों से कर ही रही है। दोनों कंपनियां अपने गठजोड़ की वजह से अब तक अपनी कारों को आपस में बांटती आई हैं। तो हो सकता है कि इस साल एसयूवी को भी वो बांटें, और एक नए नाम के साथ डस्टर आ जाए हमारे सामने। देखते हैं कि निसान और रिनॉ कैसे इस कार को अलग बना पाएंगे। इसके अलावा भी कुछ काम चल रहा है टाटा के कैंप में। जो अब तक पिछड़ती दिख रही है एसयूवी के इलाके में जहां पर सफ़ारी का नया अवतार भी बहुत ज़ोरदार कमाल नहीं दिखा पाई है अब तक जहां उसे अब बिल्कुल नए प्रोडक्ट से भिड़ना पड़ रहा है, एक तरफ़ एक्सयूवी एक तरफ़ डस्टर । तो ऐसे में कंपनी अपनी आरिया को छोटा करने में लगी हुई है पता चल रहा है। आरिया टाटा मोटर्स के पोर्टफोलियो में ऐसी गाड़ी ज़रूर रही है जो कि रिफ़ाइनमेंट, बनावट और इंजीनियरिंग के मामले में काफ़ी बेहतर रही है। और कंपनी अगर इसे छोटा बनाती है, हैंडलिंग पर काम करती है तो फिर वाकई मल्टी यूटिलिटी गाड़ी से एक अच्छी छोटी एसयूवी निकल कर आएगी।
तो देश में ये साल स्पोर्ट्स यूटिलिटी गाड़ियों का होने वाला है। छोटी और किफ़ायती एसयूवी। कुछ कंपनियों ने ऐलान कर दिया है, कुछ ऐलान करने वाली हैं। कुछ जो़रों से कुछ हल्के से। लेकिन ये गाड़ियां आते हुए बदलते भारत की कहानी आ रही हैं। 
*Published in January ** फोटो सौजन्य गूगल

February 06, 2013

Super साल होगा ये क्या !!


सुपर 2013
अगर सबकुछ अपनी रफ़्तार से चला और वो लौंच देखने को मिले जिनकी योजना थी तो साल 2013 मोटरसाइकिलों के लिए भी एक ख़ास साल रहेगा। वो भी बड़ी मोटरसाइकिलों के इलाक़े में, वो मोटरसाइकिलें जिन्हें लोग शौक की वजह से ख़रीदते हैं ज़रूरत के लिए नहीं। पिछले दो-तीन सालों में, ख़ास तौर पर हार्ली डेविडसन के भारत आने के बाद हमने भारतीय लाइफ़स्टाइल बाइकिंग में ठोस तब्दीलियां देखी हैं। कंपनी ने लगभग दो साल में दो हज़ार के आसपास मोटरसाइकिलें बेची हैं। और ये संख्या केवल इस कंपनी के बारे में नहीं बता रहा है बल्कि बाज़ार के बारे में भी बता रहा है, ग्राहकों के बारे में भी । वो मोटरसाइकिलें, जिसका सबसे सस्ता मॉडल साढ़े पांच लाख रु के आसपास शुरू होता है, जो सिर्फ़ क्रूज़र बाइक्स बनाती है, उसने क्या ऐसा किया जो सही था। तो इसमें कंपनी की सभी कोशिशों को याद करना पड़ेगा, जिनमें अच्छे प्रोडक्ट, भारतीय बाज़ार के मद्देनज़र सस्ते प्रोडक्ट, आकर्षक पेमेंट स्कीम से लेकर ठोस आफ़्टर सेल्स सर्विस नेटवर्क की कवायद भी थी। इस कंपनी के अभी तक के प्रदर्शन से कुछ चीज़ें साफ़ हुई हैं, बाज़ार थोड़ा ऑर्गनाइज़्ड दिख रहा है। पहले लाखों की मोटरसाइकिलों का बाज़ार बहुत उहापोह में दिखता था। कुछेक पॉकेट्स में और चुनिंदा शहरों में। ये भी साफ़ हुआ है कि अगर भरोसा दिलाया जाए तो हिंदुस्तानी ग्राहक लाखों रुपए मोटरसाइकिल पर ख़र्च करने से नहीं डरेंगे। 2013 के बारे में बात करते हुए इस पुरानी कहानी का ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि एक बड़ा ब्रांड जो इस साल भारत में अपने प्रोडक्ट ला सकती है, उसके लिए हार्ली का सफ़र एक बड़ी सीख हो सकता है। ये वो कंपनी है जिसने भारत में आने का ऐलान 2012 की शुरूआत में ही कर दिया था। ब्रिटिश मोटरसाइकिल कंपनी ट्रायंफ़। कंपनी ने ना सिर्फ़ ऐलान किया था भारत में एंट्री के बारे में बल्कि मोटरसाइकिलों की फ़ाइनल लिस्ट और उनकी क़ीमतों का ऐलान भी कर दिया। लेकिन 2012 के भीतर लौंच का वायदा पूरा नहीं कर पाई। जो अच्छी शुरूआत नहीं कही जा सकती है। लेकिन उम्मीद यही है कि इस साल भी आ जाए वक्त पर तो ज़्यादा नुकसान नहीं होगा। ये एंट्री मुझे इसलिए भी ख़ास लग रही है क्योंकि ट्रायंफ़ मोटरसाइकिल कंपनी हार्ली से जुदा है। केवल अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनी की बात नहीं है।





 ट्रायंफ़ का पोर्टफ़ोलियो कहीं ज़्यादा विस्तृत है। जहां हार्ली केवल क्रूज़र मोटरसाइकिलें बनाती है वहीं ट्रायंफ़ के पास हर तरीके की मोटरसाइकिलें हैं जो ना सिर्फ़ ग्राहकों को विकल्प देंगी बल्कि ग्राहकों को नए कौंसेप्ट से परिचित भी करवाएगी। यानि अब तक हम हिंदुस्तानी मोटरसाइकिल प्रेमी दो तरीके की बड़ी मोटरसाइकिलों को जानते हैं सुपरबाइक्स और क्रूज़र। लेकिन ट्रायंफ़ ने अपने पत्ते सही खोले तो ग्राहक उसकी टूरिंग मोटरसाइकिलों को पहचान पाएंगे, क्लासिक सिटी स्पोर्ट्स बाइक जान पाएंगे, ऑफ़ रोड मोटरसाइकिलें भी देख पाएंगे। लेकिन उन सबके लिए ग्राहक जाएं इससे पहले कंपनी को अपनी तरफ़ से गंभीरता दिखानी पड़ेगी, ठोस रणनीति और नेटवर्क के साथ । लेकिन सवाल ये है कि क्या कंपनी कर पाएगी ये सब ? जवाब वही जानती है कि कितना आत्मविश्वास है और भारतीय बाइकरों पर विश्वास है। लेकिन केवल एक कंपनी ही साल को ख़ास नहीं बनाएगी भारतीय बाइक बाज़ार को। ये सिर्फ़ एक सिरा है। बाकी प्रोडक्ट और भी हैं। 



जिस सेगमेंट के बढ़ने का इंतज़ार मैं कई सालों से कर रहा था वो अब दिख रहा है। यानि किफ़ायती मोटरसाइकिलों और सुपरबाइक्स के बीच के सेगमेंट में इस साल कई एंट्री हम देख सकते हैं। वैसे इस सेगमेंट में हाल में जो गतिविधियां दिखी हैं वो बता रही हैं कि ये सेगमेंट काफ़ी ज़ोरों से बढ़ रहा है। और इसके अगले चैप्टर इस साल देखेंगे। जैसे हौंडा की तरफ़ से हमने ढाई सौ सीसी की मोटरसाइकिल देखी सीबीआर 250 के तौर पर, फिर 150 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक आई। अब इस साल हौंडा की 500 सीसी वाली नई सीबीआर हम देख सकते हैं, जिसे कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेश किया था। वहीं एक सीनियर बाइक आ सकती है केटीएम की तरफ़ से। केटीएम ने अपनी 200 सीसी की ड्यूक को काफ़ी इंतज़ार करवाने के बाद भारत में पेश किया था और अब वो लेकर आ रही है अपनी ड्यूक 390। देखते हैं कि इसकी क़ीमत क्या होती है। वैसे इनके अलावा भी कुछ मोटरसाइकिलों की फेहरिस्त है। और इनकी क़ीमत 4 लाख रु के इर्दगिर्द रह सकती है। 
तो इन सब मोटरसाइकिलों के लौंच की वजह से साल 2013 को शायद वो साल पुकारा जा सकता है जब लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भारतीय बाइकर्स के लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बने। 

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February 05, 2013

Wagon R Upgrade


फिर बदला समीकरण
साल की शुरूआत हो गई है, तो कंपनियां भी न्यू ईयर को हैप्पी करने में लग गई हैं। अपने पोर्टफोलियो को नया करने में लग गई हैं। यानि जिन भी कारों को वो नया कर सकती हैं, कर रही हैं। लग्ज़री ब्रांड से लेकर सस्ती कारों तक। मर्सेडीज़, बीएमडबल्यू और ऑडी ने अपने नए प्रोडक्ट्स, नए डीलरशिप या किसी ना किसी नए उपक्रम का ऐलान किया है। मारुति ने अपनी वैगन आर का नया अपग्रेड पेश किया है बाज़ार में। और इस बदलाव में सबसे अहम जो कंपनी गिना रही है वो है बेहतर माइलेज। अपग्रेड के नाम पर जो छोटे-मोटे बदलावों  का प्रोटोकॉल है उसे तो कंपनी ने निभाया है। तो बहुत फ़र्क नहीं महसूस होगा देखने में लेकिन कंपनी का ज़ोर 8 फीसदी बेहतर माइलेज पर ज़रूर है। हो भी क्यों नहीं, महंगाई और तेल की बढ़ती क़ीमतों के बीच माइलेज तो और भी अहम मुद्दा हो गया है, केवल भारत ही नहीं, ग्लोबल स्तर पर सभी माइलेज बढ़ाने में लगे हैं। तो मारुति ने नई वैगन आर की क़ीमत को दस हज़ार रु बढ़ाया है और 20.51 किमीप्रतिलीटर का माइलेज का दावा कर रही है। 
इस कार का ज़िक्र करना इसलिए नहीं चाह रहा था क्योंकि मुझे लगता है कि ये कार कोई क्रांतिकारी प्रोडक्ट होगी अब इस अवतार में। वही वैल्यू फ़ॉर मनी प्रोडक्ट है जो रहेगी भी...लेकिन इस लौंच का मैं उस ट्रेंड की तरफ़ इशारा करने के लिए ज़िक्र कर रहा हूं जो मुझे लगता है कि फिर बदलने वाला है। डीज़ल का जो साम्राज्य फैल रहा था वो शायद थमेगा या फिर उस बाज़ार की बढ़ोत्तरी की रफ़्तार थोड़ी कम होगी। क्योंकि जिस ऐलान का इंतज़ार जानकार कर रहे थे, ग्राहक आशंकित थे और बाज़ार के पैरोकार जिसके लिए दलीलें दे रहे थे वो हो गया है।  




डीज़ल की क़ीमतें डीरेगुलेट हो गई हैं। सरकार के मुताबिक तेल कंपनियों को डीज़ल की क़ीमत को ख़ुद तय करने का आधिकार दिया गया है। ख़बर ये भी आ रही है कि 4-5 रुपए तो नहीं लेकिन हर महीने धीरे धीरे डीज़ल की क़ीमतों को बढ़ाया जाएगा। 45 पैसे प्रतिलीटर तो बढ़ाया ही गया है, साथ ही पेट्रोल की क़ीमतों को 25 पैसे प्रतिलीटर कम भी किया गया। तो सिलसिला शुरू हो गया है और कहां जाएगा अभी भी बहुत साफ़ किसी को नहीं पता है। अब तक जिस तरीके से तेल की क़ीमतों का निर्धारण हुआ है वो आम लोगों के लिए तिलिस्मी रहा है । पेट्रोल क़ीमतें सरकारी नियंत्रण में नहीं हैं फिर भी चुनावों के हिसाब से क़ीमतों को घटाने बढ़ाने की टाइमिंग दिखती रही है। वहीं डीज़ल पर सब्सिडी के लिए पिछले कुछ सालों में ज़ोरदार आलोचना सुनाई दे रही थी, ख़ासकर नेताओं के द्वारा। जिसमें सबसे बड़ी दलील ये दी जाती थी महंगी एसयूवी वाले ग्राहक डीज़ल सब्सिडी का फ़ायदा ले रहे हैं। ऐसे में कई विरोधाभासी रिपोर्ट भी आ रहे थे जिसके हिसाब से कुल डीज़ल के इस्तेमाल में पर्सनल गाड़ियां 5-7 फीसदी ही खपत करती हैं।  यूटिलिटी या स्पोर्ट्स यूटिलिटी कारें । यानि हल्ला भले ही प्राइवेट कारों का था लेकिन डीज़ल का बड़ा इस्तेमाल पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन, पब्लिक कैरिज और कारख़ानों में होता है। तो सब्सिडी दी जाए या नहीं दी जाए, इसके पक्ष विपक्ष में तमाम ठोस तर्क ज़रूर थे, जिसमें पड़ने का कोई प्रयोजन नहीं रहा है अब। लेकिन पिछले दो-तीन सालों मे डीज़ल की क़ीमतों को लेकर जो पॉलिसी के स्तर पर उहापोह रहा है उसने बाज़ार को पूरी तरीके से बदल दिया।  
ग्राहकों ने लाइन लगा दी थी डीज़ल कारों के लिए , कार कंपनियों ने डीज़ल कारों में अपनी पूरी ताक़त और लागत झोंक दी। लेकिन अब ये संतुलन फिर बदलेगा। जो शायद बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था अगर अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी था । 
तो जिस बदलाव को ग्राहक अभी सिर्फ़ क़ीमतों के तौर पर देख रहे हैं कंपनियां उन्हें आने वाले सालों के ट्रेंड और बाज़ार की शक्ल समझने के लिए देख रही हैं। और अब इस डीरेगुलेशन से लग रहा है कि कार बाज़ार में एक बार फिर से नया संतुलन आएगा। पेट्रोल और डीज़ल कारो के बीच। ग्राहकों के फ़ैसले में भी अब नए समीकरण काम करेंगे। कार ख़रीदने का फ़ैसला केवल डीज़ल की क़ीमत को देख कर नहीं लिया जाएगा। 

Royal Enfield Thunderbird 500


एक ऐसी मोटरसाइकिल जिसके साथ मेरी शुरूआत अच्छी नहीं रही थी। रॉयल एनफ़ील्ड थंडरबर्ड। एक क्रूज़र बाइक, जैसी इनफ़ील्ड की सभी मोटरसाइकिलों को हम मानते हैं, जिसका आकार प्रकार भी क्रूज़र जैसा था। लंबी हैंडिल और कम ऊंचाई वाली सीट । वो शेप जिसे आमतौर पर हम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूज़र बाइक के तौर पर देखते आए हैं। जब पहली बार ये बाइक आई थी तो मैं इसे चलाने नौएडा और ग्रेटर नौएडा के बीच एक्सप्रेस्वे पर गया था। तब सड़क बन ही रही थी, एक तरफ का ही काम पूरा हुआ था। उसी पर दोनों साइड का ट्रैफ़िक चल रहा था। और उसमें भी ट्रक ज़्यादा। और मेरे ठीक आगे चलने वाले ट्रक ने बीच सड़क ऐसी ब्रेक लगाई की कहानी ख़राब हो गई। बिना इंडीकेटर, बिना ब्रेक लाइट के ट्रक को रुका हुआ समझने में जितना वक्त लगा वो एक ऐक्सिडेंट के लिए काफ़ी था। मैंने ब्रेक किया, बाइक स्किड कर गई, कई मीटर तक घिसटती गई, साथ में मैं भी । ख़ैर । जैसा कि हर ऐक्सिडेंट के बाद होता है आप उसके हर पहलू को दिमाग़ में कई बार ध्यान दुहराते हैं, सोचते हैं। तो बहुत सारी चीज़ों में एक ख़ास चीज़ नए थंडरबर्ड ने लगा फ्रंट डिस्क ब्रेक। मेरे पास ख़ुद भी एक बुलेट ही थी और उसके ब्रेक की मुझे आदत थी, लेकिन थंडरबर्ड का डिस्क ब्रेक कहीं ज़ोरदार था। अगला पहिया तो वक्त से रुक गया, पिछला नहीं । पहली मुलाक़ात जब ऐसी रोमांचक थी तो याद तो आती ही। वैसे अब जो नई थंडरबर्ड आई है उसमें पिछले पहिए में भी डिस्क ब्रेक दिया गया है। लेकिन ये तो एक पहलू है। इसके अलावा भी कई बदलाव हैं जो नई थंडरबर्ड 500 को अहम बनाते हैं। ना सिर्फ़ ग्राहक के लिए बल्कि कंपनी के लिए भी। मोटरसाइकिल अब नए इंजिन, फीचर्स और लुक के साथ आई है। 500 सीसी का इंजिन अब लगभग 27 बीएचपी की ताक़त दे रहा है। 


जो इसे तेज़-तर्रार तो बनाती है। इसके अलावा छोटे मोटे ऐसे बदलाव हैं जो रॉयल एनफ़ील्ड की बदलती कहानी बयान कर रहे हैं। पिछले पहिए में डिस्क ब्रेक के बारे में तो बता दिया, लेकिन इसका असर एनफ़ील्ड की राइड पर कैसा पड़ा है वो भी बता दूं। आमतौर पर एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिलों की ब्रेकिंग हमेशा से बड़ा मुद्दा रही है। कमसेकम वैसे ब्रेक नहीं रहे हैं जैसा आजकल हम बाकी मोटरसाइकिलों में देखते रहे हैं। लेकिन अब एनफ़ील्ड ने उस कमी को पूरा किया है। दोनों पहियों में डिस्क के बाद एक संतुलन और कांफिडेंस महसूस होता है राइडर को।  और केवल ब्रेक ही क्यों इंजिन और गियरशिफ़्ट भी अब राइड का कहीं बेहतर तजुर्बा दे रहे हैं। शहर के बाहर ही नहीं, शहरी ट्रैफ़िक में भी। लेकिन वो तो एक पहलू है। इस मोटरसाइकिल को नया बनाने के लिए और भी कई काम किया है कंपनी ने। जैसे टेक्नॉलजी को अपडेट करना। आमतौर पर देखते रहे हैं कि मोटरसाइकिल कंपनियां जो भी टेक्नॉलजी लाएं, फीचर्स लाएं, एनफ़ील्ड मोटरसाइकिलों में वो नहीं आते थे। जिसकी एक वजह थी ग्राहकों का प्यार, जो किसी भी हालत में एनफ़ील्ड ही लेना चाहते थे, फ़ीचर्स कैसे भी हों । लेकिन हाल में हार्ली डेविडसन ने एक तरह से क्रूज़र बाइक्स की दुनिया को भारत में बदला है। हालांकि एनफ़ील्ड के मुक़ाबले बहुत महंगी हैं लेकिन फिर भी ग्राहकों को नई टेक्नॉलजी और फ़ीचर्स से तो परिचित करवाया ही है। और इस नए और बदले माहौल में थंडरबर्ड एक ऐसी ही कोशिश लग रही है। डिजिटल डिस्प्ले लगा हुआ है इसके इंस्ट्रुमेंटेशन में। जिसमें फ़्यूल गेज और घड़ी के अलावा ट्रिपमीटर भी लगेगा। अब रॉयल एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिल में एलईडी लाइट भी मिल रहा है। और ये सब दिल्ली में लगभग 1 लाख 57 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत में मिल रहा है। 

तो लग रहा है कि कांपिटिशन का असर हो रहा है। टेक्नॉलजी बदल रही है, नज़रिया बदल रहा है। एक वक्त का आरामतलब ब्रांड ख़ुद को नए तरीके से बदलने की कोशिश कर रहा है। और इन सबके बीच ग्राहकों के लिए विकल्पों में बढ़ोत्तरी हो रही है। 

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